शनिवार, 23 जनवरी 2010

ज़रा! एक नज़र ईधर भी....

विदेशी अवधारणा के मूल से जन्मे, गैर-सरकारी संगठनों का सेवा की आड़ में धंधा जारी है। सेवा भाव, खास तौर पर निस्वार्थ सेवा का भाव, जो गैर-सरकारी संगठनों का ट्रेडमार्क बन चुका है और इसकी आड़ में अनुदान पाने की होड़ भी बढ़ती जा रही है। दरअसल, समाजसेवा की आड़ में इन्हें अपना धंधा चमकाना होता है, जिसके कारण प्रतिबद्धता के साथ काम करने वाले संगठनों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। इसलिए सारे गैर-सरकारी संगठनों पर उंगली उठाना दुरूस्त न होगा। हज़ारों छोटे-बड़े ऐसे संगठन हैं, जो हज़ारों लोगों के जीवन में गुणात्मक बदलाव लाने के लिए रात-दिन काम करते हैं, और उनमें से कई को तो कड़ी आर्थिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है।
बहरहाल, मुझे मतलब उन समाजसेवियों से है, जो दूसरों के लिए पारदर्शिता बहाल करने के लिए बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, लेकिन खुद उनके यहां पारदर्शिता नहीं है। पिछले दिनों मुझे राय चंदन जी के ब्लॉग ‘लाल बुझक्कड़’ (
http://raichandan.blogspot.com) पर जाने का मौका मिला। उनके कुछ पोस्ट गैर-सरकारी संगठनों की एक अलग ही कहानी पेश करती है।
प्राप्त सूचना के मुताबिक इस ब्लॉग के ब्लॉगर सूचना के अधिकार पर कार्य करने वाली एक संगठन “कबीर” के कार्यकर्ता थे, और अरविंद केजरीवाल जी के संगठन “पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन” के लिए भी कार्य किया है। पेश है उनके कुछ आलेख यहां भी....

लूखा एनजीओ यानी लूटो खाओ एनजीओ

बॉस ने पीछे की सीट पर बैठे अपने चेले की ओर इशारा किया। इशारा भी कुछ यूं था जैसे चुटकी से सुर्ती मली हो। अक्सर ऐसा लोग पैसे के बारे में पूछने के लिए करते हैं। चेला भी पक्का शागिर्द था। उसने सहमति में सिर को हल्का सा यूं झटका दिया, जैसे सब समझ गया हो। कहा- हां! जितना कहा था,मिल गया है। गाडी अपने रफतार में सड़क पर इठलाती चली जा रही थी। खिड़की से बाहर का मनोरम नजारा लुभा रहा था। इस बातचीत में हालांकि मैं कहीं शरीक न था, लेकिन ध्यान इस मौन बातचीत की तरफ चला ही गया। खैर बताता चलूं कि बॉस राजधानी में एक एनजीओ चला रहा था और लोगों के बीच उसने अपनी प्रतिभा का लोहा जरूर मनवा लिया था। ऐसा लग रहा था मानो ड्राइवर को इन बातों से कोई मतलब ही नहीं। लेकिन वो भी था पूरा घाघ। बेफिक्र की तरह दिखना तो उसका एक छदम आवरण भर था। अब बिना भूमिका के बात पर आना ही ज्यादा उचित होगा। तो इस एनजीओ के कर्ताधर्ता हैं हमारे आज के नायक, जो कभी मीडिया में नुमाया हुआ करते थे। किसी ने सलाह दी कि भई कब तक केवल टीवी में चेहरा ही दिखाते रहोगे, या फिर पैसे भी बनाओगे। बात इन महोदय को जंच गई। अगले ही दिन लोगों ने देखा कि उनकी उठ-बैठ एक पक्के समाजसेवक के घर होने लगी। फिर एक स्वामिभक्त लोगों की टीम भी तो खड़ी करनी थी, जिनमें मिशन का जज्बा कूट-कूट कर भरा हो। एनजीओ के लिए विदेशी रकम का इंतजाम भी हो गया था। यों भी दरो-दीवार तो लोगों ने खड़ी की है। पैसे का तो एक ही रंग होता है, अंतर होता है तो बस इतना कि कहीं गांधी की तस्वीर छपी होती है, तो कहीं चर्चिल की। खैर मुददे की बात की जाए, वरना भाई लोग कम्यूनिस्ट ठहरा कर भददी सी गाली निकाल सकते हैं। हुआ यूं कि एक दिन ऑफिस एकाउन्टेन्ट को किसी बात पर झगड़ते देखा। बहस का मुददा यूं था कि बॉस ने जो हजामत कराई है, उसका पैसा एकाउन्ट में भला क्यों न जोड़ा जाए। आखिर हजामत का मकसद कहीं गरीबों को उपर उठाना ही तो है। भई टेलीविजन पर उन दुखियारों की बात करनी है, तो कम से कम चेहरा तो गरीब टाइप का न दिखे ना। तो भला हजामत का पैसा भी तो एकाउन्ट में जुड़ना ही चाहिए। खैर एकाउन्टेन्ट की मजबूरी समझ से परे नहीं थी। एक तो मंदी का असर, दूजे गरीबी के कारण पढ़ाई भी बीच में छोड़ने के दुख से वो लाचार था, ऐसे ही लोगों की तलाश तो बॉस को हमेशा होती है, जो उजबक की तरह बस समय-समय पर गरदन हिलाता रहे और शुतुरमुर्ग की तरह डांट खाने पर गर्दन फर्श में गड़ा ले। तो बॉस के अश्लील इशारे पर बात हो रही थी। गांव में आम सभा होनी थी। गांव के गरीब-गुरबे सुबह से ही इंतजार में थे। महोदय एक लंबी एसी गाड़ी से उतरे। लोगों पर यूं नजरें बिखेरी जैसे कोई एहसान किया हो। मंच पर स्वागत के लिए कुछ लोग दौड़ ही तो पड़े थे। एक लंबे रटे-रटाए भाषण के बाद, जो अक्सर वो सभाओं में दिया करते थे के बाद नारेबाजी शुरू हुई। आयोजक परेशान सा दौड़ा-दौड़ा मेरे पास आया। भई साहब, आप तो साथ में ही आए हो ना। बताओे, कितने पैसे देने हैं। मैं हक्का-बक्का सा उसके मुंह की ओर देखने लगा। भई, मुझे तो मालूम नहीं- बस इतना ही मुंह से निकला होगा। हालांकि इसके लिए मुझे हल्की सी झाड़ भी सुननी पड़ी। आता हुआ पैसा, जो दूर जा रहा था। अंत में बॉस ने अपने विश्वसनीय सिपाहसलार को आगे खड़ा किया, जिसने पूरे काईंयापन के साथ उन मासूमों से वसूली की । तो ये इशारा उस पैसे के बारे में ही किया गया था, जो ड्राइवर को देनी थी और जिसकी रकम एक बार बॉस एकाउन्ट में भी चढ़ा चुके थे। तो हुआ ना दोनों हाथ में लडडू। अपने बॉस तो ऐसे ही थे। लक्ष्मी की भी विशेष कृपा उन पर बनी रही। देखते- देखते राजधानी में दो फ्लैट के मालिक बन चुके थे। एक में खुद रहते थे और दूसरे को किराए पर उठा रखा था। किसी और को नहीं, अपने को ही। इसके बदले एक मोटी रकम एकाउन्ट में ट्रांसफर हो जाती थी। गोरा-चिटटा चेहरा, मॉडर्न लुक और आदर्शवाद का मुलम्मा लगा हो, तो लड़कियां तो फिदा होंगी ही। सो आज कल उनका दिल भी किसी और पर आया था। गाहे-बगाहे वो अपने शौक का इजहार भर करते रहते थे। पर हाय री किस्मत, निगोड़े समाज सेवक का मुखौटा जो लगा चुके थे। खैर दबा-छुपा ये रोमांस ऑफिस की फिजाओं में भी दिखने लगा था। आज-कल वे किसी यंगकमर्स पर फिदा थे। लैपटाप के साथ ऑफिस के कोने-कतरे में नजर आने लगे थे। उनकी चौकस निगाहें हर वक्त उसी का पीछा करती। आजकल बॉस की इन हरकतों से चमचों में हड़कंप मची थी। बॉस की इन हरकतों से उनकी चमचागिरी पर संदेह का साया जो लहराने लगा था। अब हनुमान की तरह दिल चीरकर अपनी भक्ति तो दिखाने से रहे। खैर, कुछ ना कुछ तो करना ही था (सो यहां चमचागिरी का स्तर और तेज हो गया था। अब होड़ किसी लड़के से हो तो, बात समझ में आती है। मामला किसी विपरीत लिंगी का हो, तो भला किया क्या जाए। आपातकाल मीटिंग होने लगी। लोगों में राय-विमर्श कर मामले को अनिश्चितकाल के लिए टालना ही उचित समझा। उड़ते-उड़ते बात मेरे तक पहुंची। एक अपना दुखड़ा यों बयान कर रहा था-क्या करें यार, आज-कल बॉस मुझसे खफा-खफा से रहते हैं। ढ़ंग से बात भी नहीं करते। कुछ ऐसी ही चर्चाएं यहां की फिजाओं में तारी रहती थी।

तो सबकुछ पर्दे के पीछे चल रहा था। बॉस को भी इसकी भनक लग चुकी थी। एक दिन कुछ हुआ यूं कि बॉस के एक चहेते को आकाशवाणी हुई भई, अब तुम भी पैसे बढ़ाने की जुगत करो। खर्च तो इतने में चलने से रहा। हालांकि सैलेरी किसी संस्थान से ज्यादा ही पाते रहे। तो हुआ यूं कि अब वे अपनी सभी घरेलू समस्याओं का जिक्र अकेले में बॉस से करने से नहीं चूकते। मौका मिलते ही दिल का दर्द लेकर बैठ जाते। बॉस को भी एहसास हो चला था कि अकेले लूटने-खाने में एक दो लोगों को शामिल करना अब जरूरी हो गया है। होता ये है कि कोई विदेशी फर्म जब किसी प्रोजेक्ट के लिए एनजीओ को रकम देती है तो सालाना उसका हिसाब भी देना होता है। तो जितनी मोटी रकम आप एकाउन्टेन्ट के साथ मिलकर उड़ा सकते हो उड़ा लो। बाकि की रकम वापस करनी होती है। इसी पैसे पर सबों की नजरें गड़ी थी जिसे लोग सैलरी के नाम पर लूटना चाह रहे थे। तो यही खुल्ला खेल फरूखाबादी चल रहा होता है। बॉस को रकम तो अपने जेब से देनी थी नहीं। सो चमचों को खुश करने के लिए उसे यह मौका अच्छा लगां। आपातकाल मीटिंग बुलाई गई। कुछ विरोध करने वालों को इस मीटिंग से अजीब से तर्क देकर बाहर रखा गया। अब बात इस पर आकर रूकी कि किसकी कितनी सैलरी बढ़े । तो जिसको जितनी जरूरत हो उतनी मिले- पर आकर बात समाप्त हुई। बढ़िया साम्यवाद के नारे का इस्तेमाल था- बॉस को अपनी मनमर्जी करने देने के लिए। तो हुआ ये कि ऑफिसब्वाय को भी इस मीटिंग से बाहर ही रखा गया क्योंकि इसके आधार पर सबसे अधिक हकदार तो वही बनता था। जिसे सरकार की रोजगार गारंटी से भी कम पैसा दिया जा रहा था और काम के नाम पर हाड़-तोड़ मेहनत़। पिता की मौत के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारियां भी अपने कमजोर कंधों पर ढ़ो रहा था। पर कहते हैं ना कि बॉस इज आलवेज राइट। तो सभी चमचे गर्दभ राग में बॉस के सुर में सुर मिलाकर ढेंचू-ढेंचू करने लगे। एक-आध विरोध के स्वर भी उठे, तो बेरहमी से दबा दिए गए। बॉस अपनी इस विजय पर लंबी सी मुस्कान बिखेरता मीटिंग से बाहर निकल गया। खैर, इसी पर एक कविता पेश करने की गुस्ताखी चाहता हूं-

कहते हैं बड़े-छोटे का भेद उचित नहीं
ठीक ही कहते होंगे
मेरी उनसे कोई शकायत नहीं
लेकिन मन उचाट हो जाता है
जब देखता हूं एक हाड-तोड़ मेहनत करते
युवा की कातर निगाहें
भारी पड़ता है किराया पूरे महीने की सैलरी पर
फिर एक भरा-पूरे परिवार की जिम्मेदारियां भी तो हैं
जो छोड़ गए हैं पिता उसकी विरासत में
लेकिन बॉस के आगे आते ही सिटटी-पिटटी गुम
आखिर क्या करे वह
न जाने कई हैं कतार में
कि कब वो धम्म से गिरे और दूसरे चढ़ बैठें
एकांत में सोचता है-
कितने खुदगर्ज हैं लोग
लेकिन देखता हूं ऑफिस के एक कोने में
चुपचाप बैठे उस लड़के को
आप पूछ सकते हैं उसके नाम के बारे में
भई नाम में क्या रखा है
यों भी नाम तो नसीब वालों के होते हैं
चाय की दूकान में काम करने वाले हों या फिर
जूते सीने वाले या झाडू पोंछा करने वाले
सबों का एक ही नाम होता है छोटू
कभी खुश होता तो मुझसे आकर कहता
भैया अब मैं पढ़े-लिखों वाला काम करूंगा
ऐसे क्षण में मैं उसे गौर से देखता
और अपनी बदहाली पर भी तरस खाता
सीढ़ियां फलांगते तालीम के शीर्ष पर तो आ पहुंचा था
लेकिन सोचता था अब क्या
अब तो पीछे लौटना भी संभव नहीं
अभी कुछ दिनों पहले की ही तो बात है
गया था पिता की बरसी पर छुटटी लेकर
मां के आंसू ने रोक लिए थे दो-चार दिन
लौटते हुए डर से कंपकंपी छूट रही थी
बॉस के अदृश्य निकले हुए नाखूनों की धार
वह महसूस कर रहा था अपने गर्दन पर
और एक ऐसे ही जाड़े के ठिठुरते दिनों में
जब हाथ उठाकर बढ़ायी जा रही थी लोगों की सैलरी
दफतर के एक कोने में सिसक रहा था लिंगप्पा
आज जब हमारे बीच नहीं है वो
याद आती है उसका मासूम सवाल
भैया अब मैं पढ़े-लिखों वाला काम करूंगा।

3 टिप्पणियाँ:

बेनामी ने कहा…

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addictionofcinema ने कहा…

bilkul sahi aur sateek baat
aj jitna nukasn desh ka terrorists aur extrimist leaders nahi kar rahe usase kahin jyada NGOs kar rahe hain, ve NGOs jo shuru to hote hain kisi aur dikhave se lekin jaldi hi apne asli maksad pe aa jate hain
chandan ko shandaar bhasha aur shaili me ek gambhir mudda uthane ke liye badhai
Vimal chandra Pandey

addictionofcinema ने कहा…

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Vimal chandra Pandey