गुरुवार, 31 जुलाई 2008

नफरत की आग....

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मंगलवार, 29 जुलाई 2008

आरटीआई फीस जमा करने में परेशानी

किशोर, दिल्ली
मौका पड़ते ही मध्य प्रदेश सरकार दावा करती है वो सूचना का अधिकार अधिनियम लागू करने में सबसे आगे रही। लेकिन मध्य प्रदेश में आरटीआई ते तहत जानकारी लेना लोहे के चने चबाने के बराबर है। देश भर में कोई भी सूचना पाने के लिये फीस के तौर पर दस रुपये का पोस्टल ऑर्डर जमा कराया जा सकता है, लेकिन मध्य प्रदेश के अफसरों को संसद में पास हुए कानून की कोई परवाह नहीं। वहां पोस्टल ऑर्डर नहीं चलता और नकदी या बैंक ड्राफ्ट की मांग की जा सकती है। लेकिन नकदी जमा कराना तो इतना मुश्किल है कि बस पूछिये मत। कुछ विभाग नॉन ज्यूडिशियल स्टांप मांगते हैं। लेकिन ग्वालियर नगर निगम ने एक बार पोस्टल ऑर्डर भी स्वीकार कर लिये थे भले ही जानकारी ना दी हो। यानी फीस के मामले में कतई एकरुपता नहीं है। जबकि मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त तिवारी जी स्वयं एक दो बार तह चुके हैं कि पोस्टल ऑर्डर तो नकदी जैसा ही है। लेकिन उनके प्रदेश के अफसर उस कानून को मानने के लिये कतई तैयार नहीं हैं जिसे इस देश के नुमाइंदों की सबसे बड़ी संस्था ने पास किया है। हो सकता है कि दूसरे प्रदेशों में भी इस तरह की परेशानी होती हो।
कितना अच्छा हो कि सरकार आरटीआई फीस के लिये अलग से स्टांप निकाले जो डाकघरों, बैंकों आदि में उपलब्ध हो ताकि लोग फीस जमा कराने में होने वाली परेशानी से बच सकें।
kishorekamaldelhi@gmail.com

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में भारी अनियमितता



परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किया तो चपरासी बनने के लायक नहीं और कम अंक प्राप्त किया तो नायाब तहसीलदार के पद पर बिठा दिया। ऐसी कहानी एक-दो नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सामने आए है। ये मामलें है छत्तीसगढ लोक सेवा आयोग का। जहॉ सूचना के अधिकार के तहत परीक्षाथियों के चयन में भारी संख्या में अकल्पनीय भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। अच्छी परीक्षा और अच्छा साक्षात्कार देने के बाद जब कई परीक्षार्थियों का चयन नहीं हो पाया, तो अभ्यार्थियों ने सूचना कानून के तहत इस परीक्षा के उत्तर पुस्तिका दिखाने के मांग की। आयोग ने इसे नियम-कानून का हनन का दलील देकर उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया। लेकिन बड़ी संख्या में छात्रों के आंदोलन के बाद बात वहॉ के विधानमंडल तक पहुंची तो पहली खेप में 15 छात्रों की उत्तर पुस्तिका दिखाई गई। लेकिन इसके तुरंत बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश के तहत और उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया गया। दिखाइ गई 15 उत्तर पुस्तिका को देखने के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिसमें पाया गया कि उस 15 उत्तर पुस्तिका में से 9 उत्तर पुस्तिका के जांच में गड़बड़ है। इनमे 300 अंक के एक विषय, जिसमें 60 अंक के 5 प्रश्न थे। जिसके उत्तर पुस्तिका में 60 अंक के उत्तर को 75-75 अंक का मानकर केवल चार उत्तरों को ही जॉचा गया। इसी विषय के कुछ अन्य उत्तर पुस्तिका के 5 प्रश्नों में दो प्रश्न को 50-50 अंक और शेष 3 को 60-60 अंक के आधार पर जांच कर दिया गया था। साथ ही प्रश्न के सही जवाब लिखने पर 20 में से 10 अंक मिले और इसी प्रश्न के असंबंधित उत्तर देने पर एक अभ्यार्थी को 20 में से 13 अंक दे दिया गया था। इसी तरह संक्षिप्त नोट के प्रश्न पर पूर्ण गलत उत्तर लिखने पर भी पूरे अंक दिए गए थे। इसके अलावा अन्य विषय में अनुवाद के सही जबाव देने पर शून्य अंक दिया गया। इस तरह की कई गड़बिड़या पाई है। आयोग द्वारा संचलित न्यायायिक सेवा परीक्षा में एक परीक्षार्थी के पूरे उत्तर पुस्तिका के जॉच के बावजूद बीच के दो पृष्ठ(पेज न 10, 11) को जांच ही नहीं किया गया था। इसी प्रकार आयोग के गूढ़ हथियार स्केलिग प्रणाली में भारी गड़बड़ी पाई गई है। राजेश कुमार(रोल न 105188 वर्ष 2003) के सांिख्यकी के 300 अंक की परीक्षा में स्केलिंग के बाद 304 अंक दे दिया गया था। एक अन्य अभ्यार्थी ग्रजेस प्रताप सिंह(रोल न 66136) अपराध शास्त्र में 233 अंक मिले थे जिनका स्केलिंग बाद शून्य कर दिया गया था। इसके अलावा एक अन्य चयनित छात्र राजू सिंह चौहान (रोल न 31106) ने एक वैकल्पिक विषय में 182 अंक प्राप्त किए थे जिनका अंक स्केलिग के बाद 188 अंक कर दिया गया। इसी तरह दो अन्य छात्र जिन्होंने एक सांख्ययिकी में 235-235 अंक प्राप्त किए थे। स्केलिंग के बाद उसे शून्य बना दिया गया। मानव शास्त्र विषय के छ: विद्यार्थियों (16834, 102564, 40912, 77632, 97129, 102526) ने 300 में प्रत्येक ने 200 अंक प्राप्त किए थे। जिसे स्केलिंग के बाद क्रमश: 170, 210, 205, 196, 196, और 239 कर दिया गए थे। इसी परीक्षा में वषाZ डोगरे का कर्ट माक्र्स से उपर 1290 अंक प्राप्त करने के बाद भी चयन नहीं किया गया। जबकि उससे नीचे 1274, 1273, 1247 अंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यार्थियों का चयन कई पदों पर चयनित किया गया है। इसी प्रकार इस परीक्षा की टॉपर रही पदमीनि भोई जिन्होंने कुल अंक 1481 प्राप्त किए थे और स्केलिग के बाद इसका कुल अंक 1501 कर दिया गया। साथ ही कुन्दर कुमार जिन्होंने कुल अंक 1523 अंक प्राप्त किए थे। जिनका स्केलिंग के बाद कुल अंक 1314 कर दिया गया। लेकिन कुन्दन का किसी भी पद पर चयन नहीं सका था। इन्हीं आंकडे़ के आधार पर बिलासपुर उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई, तो आयोग के अध्यक्ष अशोक दरवाड़ी ने स्वीकार किया कि आयोग ने परीक्षा में बड़ी मात्रा में गड़बड़ी की है। जिस पर उच्चतम न्यायालय में केस चल रही है। जिन्हें वर्तमान मे जमानत पर रिहा किया गया है। साथ ही आयोग के एक अन्य सदस्य अमोद सिंह फरार है।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

भ्रष्टाचार से लड़ने वालों की हत्या क्यों ?

हमारे देश में आजादी के बाद लोकतंत्र तो स्थापित हो गया लेकिन यह जमीनी स्तर पर लागू होने से अभी भी कोसों दूर है। तभी तो यहां अपना अधिकार मांगने पर लोगों की हत्या कर दी जाती है। देश की नौकरशाही और सत्ता का चरित्र अब भी वही है जो गुलामी के समय था। यही वजह है कि झारखंड में सामाजिक कार्यकर्ता ललित मेहता की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उन्होंने सूचना के अधिकार के जरिए राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी अधिनियम का सोशल आॅडिट करने का प्रयास किया था। वह इस योजना के तहत किए गए खर्च को आधिकारिक और वास्तविक धरातल पर जांचना चाहते थे। लेकिन सोशल आॅडिट से एक दिन पहले ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। इंजीनियर से कार्यकर्ता बने 36 वर्षीय ललित मेहता की किसी से जातीय दुश्मनी नहीं थी। वह तो पलामू जिले में भोजन के अधिकार अभियान के प्रमुख सदस्य थे।
पुलिस ने उनके मृत शरीर का जल्दबाजी में पोस्टमार्टम कराया और घटनास्थल से 25 किमी दूर ले जाकर दफना दिया। ललित मेहता की हत्या के 12 दिनों बाद सोशल आॅडिट हुआ और पाया गया कि जिले में योजना के तहत खर्च किए गए 73 करोड़ रूपये की राशि का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदारों, अधिकारियों और विकास माफिया के हिस्से में गया है। सोशल आॅडिट से पलामू के लोगों ने जाना कि किस प्रकार उनके हिस्से के धन का हिस्सा गलत तरीकों से भ्रष्ट लोगों के पास पहुंच रहा है। रांची के थियोलाजिकल काॅलेज ग्राउंड में हजारों की तादाद में लोग इस हत्या के विरोध में एकत्रित हुए। इन लोगों ने ललित मेहता की हत्या की सीबीआई जांच की और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
ललित मेहता के अलावा देश के अनेक हिस्सों में इस प्रकार की घटनाएं हो रही हैं। अनेक स्थानों पर सूचना मांगने पर कार्यकर्ताओं को धमकियां मिल रही हैं। राजस्थान के झालावाड़ और बेन्सवाडा जिलों में पिछले 6 महीनों के दौरान सोशल आॅडिट करने वाली टीमों पर कई नियोजित हमले हुए हैं। कर्नाटक में भूमि घोटाले को उजागर करने कर सामाजिक कार्यकर्ता लियो सलदान्हा और उनकी पत्नी डाॅ. लक्ष्मी नीलकांतन को कर्नाटक पुलिस और फोरेस्ट डिपार्टमेंट ने चंदन की लकड़ी की तस्करी और चोरी के मामले में उन पर निशाना साधा। इन्होंने विवादास्पद बंगलौर-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कोरिडोर प्रोजेक्ट में भूमि घोटाले का पर्दाफाश करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी।
इसी प्रकार झारखंड के ही गिरीडीह में कमलेश्वर यादव नामक कार्यकर्ता की इन्हीं कारणों के चलते हत्या कर दी गई। उडीसा के कोरापुट जिले के नायब सरपंच और उडीसा आदिवासी मंच के सदस्य नारायण हरेका को भ्रष्टाचार उजागर करने पर मौत के घाट उतार दिया गया। हत्या से पहले उन्होंने ब्लाॅक कार्यालय से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की जानकारी मांगी थी। ये सभी मामले दिखाते हैं कि लोकतांत्रित तरीकों से अपना अधिकार मांगना कितना खतरनाक है।
दरअसल हमारी व्यवस्था में एक बड़ा तबका ऐसा है जो शक्तिशाली है और सूचना देने से घबराता है क्यांेकि इससे उसका नुकसान हो सकता है। ये तबका सूचना के प्रवाह को हर तरह से रोकने का प्रयास करता है। और इसके लिए उसे जो भी हथकंडे अपनाने पडें़ वह अपनाने से नहीं चूकता। यही वजह है कि लोगों की हत्याएं कराईं और उन्हें धमकाया जा रहा है। ऐसे लोगों से सख्ती से निपटने की जरूरत है ताकि असल में जनतंत्र स्थापित हो सके। लोगों को कल्याणकारी योजनाओं और कानूनों से लाभ हो सके व पारदर्शिता और जवाबदेही तय हो सके। ऐसे लोगांे से निपटने की जिम्मेदारी सरकार और नौकरशाह की है लेकिन जब यहां भी एक बड़ा वर्ग ऐसा हो तो भ्रष्टाचार से लड़ने वाले इन लोगों के पास क्या विकल्प बचता है ?

पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीय युद्धबंदियों की संख्या नहीं जानती सरकार

सरकार के विदेश और रक्षा मंत्रालय ने पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीय युद्धबंदियों की संख्या अलग-अलग बताई है। रक्षा मंत्रालय ने इनकी संख्या 54 जबकि विदेश मंत्रालय ने इनकी संख्या 74 आंकी है। दूसरी तरफ पाकिस्तान हमेशा कहता रहा है कि उसकी जेलों में भारतीय युद्धबंदी नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत दायर एक एक अर्जी के जवाब में यह तथ्य सामने आए हैं। आरटीआई कार्यकर्ता हरीकुमार ने यह अर्जी दायर कर रक्षा और विदेश मंत्रालय के अलावा सेना के तीनों अंगों इस बारे में जानकारी मांगी थी।
अर्जी के जवाब में मिलिट्री इंटेलिजेन्स के डायरेक्टर ने कहा है कि उनके पास इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान 2 अधिकारियों सहित 19 सैनिकों के लापता होने की बात कही, लेकिन पाकिस्तानी जेलों में इनके कैद होने की पुष्टि से इंकार किया।
वायुसेना मुख्यालय ने इस बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी होने से इंकार किया। जबकि नौसेना ने कहा है कि उनका कोई भी सैनिक पाकिस्तानी जेलों में नहीं है।
गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान की सांवैधानिक समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि दोनों देश अपनी-अपनी जेलों में बंद युद्धबंदियों के साथ सभी कैदियों की सूची एक-दूसरे को सौंपेंगे। साथ ही उनका आदान-प्रदान भी किया जाएगा। समिति ने यह अनुमान लगाया था कि भारतीय जेलों में 450 पाकिस्तानी कैदी हैं जबकि पाकिस्तानी जेलों में युद्धबंदियों सहित 500 भारतीय कैदी हैं। इन कैदियों के छूटने में हो रही देरी वजह इनकी संख्या जानने के लिए ही आरटीआई अर्जी दायर की गई थी।

किसानों की मंजूरी के बिना हुआ उनका बीमा

हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले में एक को-आपरेटिव बैंक अधिकारियों की मनमानी का मामला सूचना के अधिकार जरिए उजागर हुआ है। कुरूक्षेत्र सेंट्रल को-आपरेटिव बैंक के इन अधिकारियों ने बीमा कंपनियों के साथ मिलकर गलत तरीकों का इस्तेमाल करते हुए 53352 किसानों का बीमा कर दिया और प्रीमियम राशि उनके खातों से काट ली। जबकि किसानों को इसका पता भी नहीं चला। अधिकारियों द्वारा किसानांे की बीमा पोलिसी का यह गडबडझाला चार साल तक चलता रहा। इन चार सालों में किसानों के खातों से कुल 31.19 लाख रूपए प्रीमियम के रूप में वसूले गए। किसानों के प्रीमियम की यह राशि लोन के जरिए हासिल की गई। इन अधिकारियों ने साल 2003 में मरकंडा को-आपरेटिव सोसाइटी, शाहबाद सोसाइटी के 1754 किसानों का और कैथल को-आपरेटिव सोसाइटी के 738 किसानों का बीमा किया। इन किसानों के खातों से कुल 1.39 लाख की प्रीमियम राशि काट ली गई। किसानों को लगा कि यह काम किसी सरकारी योजना के तहत किया जा रहा है, इस कारण उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। किसानों की आपत्ति न होने पर इन अधिकारियों का उत्साह और बढ़ गया और उन्होंने अगले साल भी अपने गलत कृत्यों को जारी रखा।
साल 2004 में इन अधिकारियों ने विभिन्न को-आपरेटिव सोसाइटी के 25715 किसानों का बीमा कर दिया और 15.05 लाख की प्रीमियम राशि उनके खाते से काट ली। इसी प्रकार 2005 में 16 को-आपरेटिव सोसाइटी के 17594 किसानों का बीमा कर दिया गया और 10.24 लाख की प्रीमियम राशि काट ली। साल 2006 में अजरावर, थास्की, मिरंजी, रोहती, झाखवाला, इस्माइलाबाद, आमिन और ज्योतिसर को-आपरेटिव सोसाइटी के 7551 किसानों का बिना बताए बीमा कर दिया गया। इन किसानों की कुल प्रीमियम राशि 4.50 लाख थी जो उनके खातों से काट ली गई।
ये हैरान करने वाले तथ्य हाल ही में किसान और सामाजिक कार्यकर्ता गुलाब सिंह द्वारा सूचना के अधिकार के तहत दायर अर्जी के जवाब में सामने आए हंै। उन्होंने सूचना के अधिकार के माध्यम से कुरूक्षेत्र सेन्ट्रल को-आपरेटिव बैंक के मेनेजिंग डायरेक्टर से इस मामले में सूचनाएं मांगी थीं।

मणिपुर के गृह विभाग पर आरटीआई न मानने का आरोप

सेंटर फोर आर्गनाईजेशन रिसर्च एंड एजुकेशन अर्थात कोर ने मणिपुर के गृह विभाग पर आरटीआई कानून न मानने का आरोप लगाया है। कोर के संयोजक वाहेंगबम जोयकुमार ने गृह विभाग के राज्य जन सूचना अधिकारी से आरटीआई कानून के तहत जानकारी मांगी थी, जिसे देने से मना कर दिया गया।
31 अगस्त 2007 में अपनी अर्जी में जोयकुमार ने राज्य सुरक्षा कमीशन, राज्य स्तर के पुलिस शिकायत प्राधिकरण और जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण के नाम, पते, शैक्षणिक योग्यताएं, आफिस क पते और चालू टेलिफोन नंबरों की जानकारी मांगी थी। अपील में पुलिस अधीक्षक, पुलिस स्टेशनों, मोबाइल नंबरों की सूचना और बंद हुए नंबरों की वजह पूछी गई थी। जवाब में राज्य जन सूचना अधिकारी ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के अलावा मणिपुर पुलिस आरटीआई के तहत सूचना देने के लिए बाध्य नहीं है। जानकारी न मिलने पर प्रथम अपील प्राधिकरण में एक अन्य अपील की गई। लेकिन नियत समय पर वहां से भी कोई जानकारी नहीं मिली। इसके बाद जोयकुमार ने मणिपुर सूचना आयोग में अपील दायर की।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद आयोग ने अपने निर्णय में राज्य जन सूचना अधिकारी को दो सप्ताह के भीतर जानकारी देने को कहा। जन सूचना अधिकारी पर सूचना ने देने पर कारण बताओ नोटिस और 1500 रूपये का जुर्माना भी किया गया। अंत में जन सूचना अधिकारी द्वारा जानकारी उपलब्ध कराई गई लेकिन उसमें अधिकांश प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। जवाब में राज्य स्तर के पुलिस शिकायत प्राधिकरण और जिला स्तर के पुलिस शिकायत प्राधिकरण के आफिस के पते और टेलिफोन नंबर नदारद थे। पुलिस अधीक्षक और पुलिस स्टेशन के टेलिफोन के नंबरों की जानकारी भी नहीं थी।
जन सूचना अधिकारी के जवाबों से असंतुष्ट जोयकुमार ने दूसरी अपील दायर की दी है और राज्य पुलिस पर लोगों की सुरक्षा न करने का आरोप लगाया है।

मिड डे मील का एक तिहाई अनाज कहां गया ?

केन्द्र की मिड डे मील योजना के अनाज का एक हिस्सा अनेक कारणों के चलते नष्ट हो जाता है, लेकिन दिल्ली में स्थिति बहुत ही खराब है। राजधानी के सरकारी स्कूलों के बच्चों को आने वाला मिड डे मील योजना का एक तिहाई अनाज नष्ट हो रहा है। जिस कारण स्कूली बच्चों को निर्धारित भोजन और कैलोरी से कम मात्रा मिल रही है। यह बर्बाद हुआ अनाज कहां गया, इस बारे में न तो सरकार को कुछ पता है और न ही दिल्ली नगर निगम को।
राज्य सरकार द्वारा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को प्रदान किए गए आंकडों पर नजर डालें तो पता चलता है कि साल 2007-08 के दौरान भारतीय खाद्य निगम के गोदामों से दिल्ली की मिड डे मील योजना के लिए 11080 टन अनाज उठाया गया। इस अनाज का 35 फीसद हिस्सा यानि 3878 टन अनाज नष्ट हो गया। परिणामस्वरूप दिल्ली के प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले 10.43 लाख बच्चों को मात्र 65 ग्राम पक्का भोजन ही दिया गया। इसके अलावा भोजन से निर्धारित 300 कैलोरी मात्रा से 50 कैलोरी बच्चों को कम मिली। यह तथ्य एक आरटीआई अर्जी के जवाब से सामने आए हैंैै।
दिल्ली में होने वाली मिड डे मील के अन्न की यह बर्बादी देश के किसी भी राज्य से कई गुना अधिक है। भारतीय खाद्य निगम के नियमों के मुताबिक अधिकतम 2 प्रतिशत अन्न परिवहन, भंडारण आदि के चलते नष्ट हो सकता है, जो दिल्ली में नष्ट हुए अन्न से 17 गुना कम है। खाद्य निगम ने दिल्ली में अन्न की इस बर्बादी को बहुत अधिक बताया है।
इन आंकडों ने दिल्ली की मिड डे मील मोनिटरिंग सिस्टम पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। दिल्ली के मोनिटरिंग सिस्टम को अन्य राज्यों से काफी कमजोर माना जा रहा है। यहां महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश की तरह किसी प्रकार की समिति गठित नहीं की जाती जो मिड डे मील योजना पर निगरानी रख सके। साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि योजना के अन्न का यह हिस्सा खुदरा बाजार में पहुंचा है।

मंत्री के स्नातक होने का दावा झूठा साबित

सूचना के अधिकार ने उडीसा के एक मंत्री का झूठ सार्वजनिक कर दिया है। राज्य के परिवहन और वाणिज्य मंत्री जय नारायण मिश्रा के स्नातक होने का दावा गलत साबित हुआ है। 2004 के असेम्बली चुनावों के समय दायर हलफनामें में उन्होंने अपने आपको स्नातक बताया था। नोमिनेशन पेपर में उन्होंने दावा किया था कि 1984 में संभलपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक परीक्षा पास की है। लेकिन जब इसकी जांच की गई तो पता चला कि उनका यह दावा झूठा है।
संभलपुर विकास मंच द्वारा दायर एक आरटीआई अर्जी के जवाब से यह खुलासा हुआ है। इस अर्जी में संभलपुर विकास मंच ने मंत्री के स्नातक होने के दावे को चुनौती दी गई थी। संभलपुर के सब कलेक्टर और निर्वाचन अधिकारी कैलाश साहू ने जब इस मामले की जांच की तो यह तथ्य सामने आए। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट जिला कलेक्टर पीके पटनायक के सुपुर्द कर दी है। अधिकारियों की गई यह जांच संभलपुर विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर आधारित है।
मंत्री ने कोर्ट में दायर किए गए अपने हलफनामें में दावा किया था कि उन्होंने संभलपुर विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले बुर्ला नाक काॅलेज से स्नातक की परीक्षा पास की है। विश्वविद्यालय से जब इस बाबत जानकारी मांगी गई तो मंत्री के दावे को सही साबित करने वाले दस्तावेज नहीं पाए गए। विवि के अधिकारियों ने पाया कि कोई जय नारायण मिश्रा नामक व्यक्ति नाक काॅलेज की उस वर्ष की स्नातक परीक्षा में नहीं बैठा था। नाक काॅलेज में मंत्री के इंटरमीडिएट के रिकाॅर्ड तो मिल गए हैं, लेकिन उनके स्नातक होने का कोई साक्ष्य नहीं मिला।

स्कूल को दिखानी होगी उत्तर पुस्तिका

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए खुशखबरी। सूचना का अधिकार अब उनके लिए वरदान साबित होने जा रहा है। केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में एक सरकारी स्कूल को छात्रों की उत्तर पुस्तिका दिखाने का निर्देश दिया है। छात्र मोहसिन द्वारा दायर एक आरटीआई अर्जी के जवाब में सूचना आयुक्त ओ पी केजरीवाल ने यह निर्णय दिया।
दिलशाद गार्डन के गवर्नमेंट सीनियर सेकेन्डरी स्कूल में पढ़ने वाला मोहसिन मार्च के प्रथम सप्ताह में हुई नौंवी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में फेल हो गया था। 31 मार्च को उसका परिणाम आया जिसमें उसे अंग्रेजी, गणित और सामाजिक विज्ञान विषय में फेल बताया गया। मोहसिन ने अपने सभी विषयों की उत्तर पुस्तिका देखने के लिए एक अप्रैल को आरटीआई के तहत आवेदन किया था। अर्जी में उन्होंने उत्तर पुस्तिका जांचने वाले शिक्षक का नाम और उसका रिपोर्ट कार्ड न दिए जाने का कारण भी पूछा। इसके अलावा अपने मोहसिन ने उसकी कक्षा में पास छात्रों का प्रतिशत, ग्रेस अंक के नियम और इसका लाभ उठाने वाले छात्रों का विवरण भी मांगा था।
जब उनकी अर्जी का स्कूल प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया तो मामला केन्द्रीय सूचना आयोग के पास पहुंचा। आयोग ने न केवल मोहसिन बल्कि उसके सहपाठियों की उत्तर पुस्तिका भी दिखाने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्कूल को समय पर सूचना उपलब्ध न कराने के जुर्माना भी लगाया। सूचना आयुक्त ने निर्णय देने के बाद कहा कि पारदर्शिता हेतु कानून के अनुसार निर्णय दिया गया है।

स्कूल को दिखानी होगी उत्तर पुस्तिका

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए खुशखबरी। सूचना का अधिकार अब उनके लिए वरदान साबित होने जा रहा है। केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में एक सरकारी स्कूल को छात्रों की उत्तर पुस्तिका दिखाने का निर्देश दिया है। छात्र मोहसिन द्वारा दायर एक आरटीआई अर्जी के जवाब में सूचना आयुक्त ओ पी केजरीवाल ने यह निर्णय दिया।
दिलशाद गार्डन के गवर्नमेंट सीनियर सेकेन्डरी स्कूल में पढ़ने वाला मोहसिन मार्च के प्रथम सप्ताह में हुई नौंवी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में फेल हो गया था। 31 मार्च को उसका परिणाम आया जिसमें उसे अंग्रेजी, गणित और सामाजिक विज्ञान विषय में फेल बताया गया। मोहसिन ने अपने सभी विषयों की उत्तर पुस्तिका देखने के लिए एक अप्रैल को आरटीआई के तहत आवेदन किया था। अर्जी में उन्होंने उत्तर पुस्तिका जांचने वाले शिक्षक का नाम और उसका रिपोर्ट कार्ड न दिए जाने का कारण भी पूछा। इसके अलावा अपने मोहसिन ने उसकी कक्षा में पास छात्रों का प्रतिशत, ग्रेस अंक के नियम और इसका लाभ उठाने वाले छात्रों का विवरण भी मांगा था।
जब उनकी अर्जी का स्कूल प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया तो मामला केन्द्रीय सूचना आयोग के पास पहुंचा। आयोग ने न केवल मोहसिन बल्कि उसके सहपाठियों की उत्तर पुस्तिका भी दिखाने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्कूल को समय पर सूचना उपलब्ध न कराने के जुर्माना भी लगाया। सूचना आयुक्त ने निर्णय देने के बाद कहा कि पारदर्शिता हेतु कानून के अनुसार निर्णय दिया गया है।

मुंबई में बढ़ती लंबित मामलों की संख्या

सूचना का अधिकार लोगों का जागरूक और सशक्त बनाने का एक अहम हथियार है लेकिन लंबी न्यायिक प्रक्रिया और विचाराधीन मामले आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का सबब बने हुए हैं। मार्च माह तक मुबंई के सूचना आयुक्त के यहां 3600 विचाराधीन मामलें लंबित थे, जबकि देश के अन्य राज्यों में ऐस मामलों की कुल संख्या 16000 हैै।
कार्यकर्ताओं ने हाल ही में मुंबई सूचना आयुक्त और विभिन्न जन सूचना अधिकारियों के यहां से सूचना हासिल की और पाया कि 2007 में राज्य में 3 लाख से भी अधिक सूचना के अधिकार के तहत आवेदन प्राप्त हुए हैं। यह आवेदन महाराष्ट्र को सूचना के अधिकार को इस्तेमाल करने वाला अग्रणी राज्य बनाते हैं। लेकिन यदि इसी दर से आवेदनों की संख्या में इजाफा होता रहा तो 2009 में 10 लाख से अधिक आवेदनों के प्राप्त होने की उम्मीद है, जिसका अर्थ यह भी होगा की लंबित मामले भी इसी दर से बढ़ जाएंगे। इन लंबित मामलों की वजह से बहुत से अति संवेदनशील मामलों के निर्णयों में देरी हो रही है।
एक तरफ राज्य जहां पुराने मामलों के निपटारे में लगा वहीं दूसरी तरफ पुणे के सूचना आयुक्त वीवी कुवालेकर ने एक माह के भीतर 250 मामलों के निपटारे का रिकाॅर्ड कायम किया है। हाल ही में कुवालेकर और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सेमिनार में बढ़ते लंबित मामलों पर चिंता व्यक्त की है। श्री कुवालेकर ने लंबित मामलों को कम करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। उन्होंने आवेदक और जन सूचना अधिकारी के बीच एक अनौपचारिक बातचीत से ऐेसे मामलों में कमी लाने का सुझाव दिया था। साथ ही उन्होंने सरकारी अधिकारियों द्वारा फाइलों को ठीक प्रकार से सहेजकर ने रखने की धारणा को भी लंबित मामलों की बड़ी वजह माना। कुवालेकर ने पुणे के समान मुंबई में भी ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कानून लाने की बात कही ताकि लंबित मामलों में कमी लाई जा सके।

रांची विश्वविद्यालय पर 4 लाख क्षतिपूर्ति जुर्माना

सूचना के अधिकार के जरिए जानकारी ने देने पर जन सूचना अधिकारियों और संस्थानों पर गाज गिरनी जारी है। हाल ही में यह गाज गिरी रांची विश्वविद्यालय और इसके पूर्व पीआईओ पर। रांची विश्वविद्यालय पर पदोन्नति के लिए दोहरे मापदंप अपनाने पर 4 लाख रूपये का क्षतिपूर्ति जुर्माना लगााया है। साथ ही सूचना न देने पर विश्वविद्यालय के पूर्व जन सूचना अधिकारी पर 40 हजार रूपये का जुर्माना भी ठोंका गया। जुर्माने की यह राशि पूर्व पीआईओ सुधांधू कुमार वर्मा के वेतन से काट ली जाएगी। आयोग ने विश्वविद्यालय को सूचना देने के नौ अवसर दिए थे, लेकिन इसके बाद भी जब आवेदकों को सूचना नहीं दी गई तो सूचना आयुक्त गंगोत्री कुजूर ने यह कठोर निर्णय दिया।
यह निर्णय विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों की आरटीआई अर्जी के जवाब में आया है। प्रोफेसर अभिताभ होरे और पीएन पांडे ने विश्वविद्यालय प्रशासन से उनकी पदोन्नति में हुए भेदभाव का कारण पूछा था। इन्होंने विश्वविद्यालय से पदोन्नति के लिए वरिष्ठता को तरजीह न देने की वजह जाननी चाही थी।
प्रोफेसर होरे और पांडे ने 2005 में पोस्टग्रेजुएट जूलाॅजी विभाग में प्रमुख के पद पर पदोन्नत किए गए के एन दूबे की नियुक्ति को चुनौती दी थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह नियुक्ति गलत तरीकों से की गई है और इसमें उनकी वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखा गया।
आरटीआई दायर करने से पहले श्री पांडे ने विवि के चांसलर से इसकी शिकायत की थी। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दूबे के 1973 में हुए चयन में भी गडबडी का आरोप लगाया। न्यायालय ने यह मामला वापस चांसलर को रेफर कर दिया। विश्वविद्यालय से रवैये से निराश हो श्री होरे और पांडे ने अन्ततः आरटीआई के माध्यम से इस बारे में जानकारी मांगी।
प्रारंभिक स्तर पर जब कोई जानकारी नहीं मिली तो मामला सूचना आयोग के पास पहुंचा। आयोग ने मामले में कठोर रूख अपनाने हुए विश्वविद्यालय को दो-दो लाख रूपये क्षतिपूर्ति के रूप में दोनों आवेदकों को देने का आदेश दिया। विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने आयोग के इस निर्णय का स्वागत किया है।

आरटीआई ने दिलाया बलात्कार पीड़िता को न्याय

कई जगह न्याय की गुहार लगाने के बाद गुजरात में जब एक बलात्कार पीड़िता को न्याय नहीं मिला तो उसने सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल करते हुए प्रश्न किया कि उसे कब न्याय मिलेगा ? इस 15 साल की लड़की का बलात्कार पिछले साल फरवरी में उस वक्त हुआ जब वह दक्षिण गुजरात के उमरपाडा ताल्लुक में कक्षा 8 में पढ़ रही थी। बलात्कार के बाद लड़की गर्भवती हो गई और उसने एक लड़के को जन्म दिया जिसकी 15 दिन के बाद मृत्यु हो गई। लड़की ने न्याय के लिए पुलिस का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पुलिस के यहां से उसे निराशा ही हाथ लगी। हर जगह से निराश और हताश हो चुकी इस लड़की ने अन्ततः आरटीआई का इस्तेमाल किया और 23 जनवरी 2008 में मंगरोल में आरटीआई दायर की।
आरटीआई अर्जी में पीड़ित ने मंगरोल के सब इंस्पेक्टर और उमरपाडा चैकी के सहायक सब इंस्पेक्टर से पिछले साल 10 अक्टूबर में की गई शिकायत की प्रगति रिपोर्ट मांगी। साथ ही उसने उन सभी अधिकारियों की जानकारी मांगी जिनके पास उसका मामला लंबित रहा। पुलिस से जवाब न मिलने पर पीड़िता ने गुजरात सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। 16 मई को गुजरात सूचना आयोग ने निर्णय दिया कि पीड़िता को दस दिनों के भीतर निःशुल्क सूचनाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ की आयोग प्रश्न किया कि सूचना न देने पर क्यों न दोषी व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जाए। आयोग के निर्णय के बाद 29 मई को पिछले साल 10 अक्टूबर को की गई शिकायत को आधार बनाकर पुलिस ने पीड़िता की शिकायत दर्ज की ।
सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अपनी आवाज उठाते हुए मंगरोल के इंस्पेक्टर से प्रश्न किया कि वह अधिकारी कहां है जिसने बंदूक दिखाकर उसे घर आकर धमकी दी थी। लड़की ने स्थानीय पुलिस पर आरोप लगाया कि उसका केस दबाने के लिए उसने बलात्कारी से 50 हजार रूपये की घूस ले रखी है। पुुलिस ने जान बूझकर उसका केस दबाने की कोशिश की है और पुलिस की एफआईआर में भी उसके बलात्कार की गलत तारीख दर्ज है।
सूचना आयोग में मामले की सुनवाई के बाद गृह विभाग के अधिकारियों ने आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करने के आदेश दे दिए हैं।

अधिकारियों की रेटिंग अब आरटीआई के दायरे में

केन्द्रीय सूचना आयोग ने एक आरटीआई अर्जी की सुनवाई के बाद निर्णय दिया कि रक्षा सेवाओं में अफसरों की रेटिंग और उनसे संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा सकता है। उच्च अधिकारियों द्वारा की गई टिप्पणियों को अब तक गुप्त माना जाता था, लेकिन अब वे सूचना के अधिकार के दायरे में आ गईं हैं।
आयोग ने लखनउ के एक रिटायर्ड कर्नल इंदर पाॅल की अर्जी की सुनवाई के बाद यह निर्णय दिया। कर्नल पाॅल ने आम्र्ड फोर्सेस मेडिकल सर्विस के लिए अपील की थी, लेकिन उनकी अपील को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि डिपार्टमेंट प्रमोशन कमिटी को सार्वजनिक करने का मतलब एसीआर को सार्वजनिक करना होगा, जो प्रतिबंधित है। उनकी दूसरी अपील को भी इसी आधार पर निरस्त कर दिया गया। अन्ततः उन्होंने आयोग में अपील की और आयोग ने उनके पक्ष में निर्णय दिया। आयोग ने 10 दिनों के भीतर संबंधित दस्तावेजों को उपलब्ध कराने का आदेश साथ है। साथ ही रक्षा मंत्रालय को भी कहा है कि इस प्रकार के दस्तावेज नियत समय पर उपलब्ध कराए जाएं।

मुंबई में शुरू होगा आरटीआई पाठ्यक्रम

भारत के बार काउंसिल से मान्यता प्राप्त मुंबई के के सी लाॅ काॅलेज में शीघ्र ही सूचना के अधिकार के दो पाठ्यक्रम शुरू होने वाले हैं। यह पाठ्यक्रम शुरू होने के साथ ही काॅलेज देश में इस प्रकार का पहला लाॅ संस्थान बन जाएगा। इसी साल जुलाई सेशन से शुरू होने वाला यह पाठ्यक्रम फाउंडेशन और एडवांस स्तर पर शुरू किया जाएगा।
फाउंडेशन स्तर पर शुरू किए गए कोर्स में कानून के इतिहास, इसके प्रावधानों और आरटीआई मामलों के अध्ययन की पढ़ाई की जाएगी जबकि एडवांस स्तर पर सूचना प्राप्त करने की उन विधियों और तरीकों को बताया जाएगा जिसमें सरकार के मना करने के बावजूद सूचना हासिल की जा सकें। सूचना न देने की सरकारी विभागों की बहानेबाजी से निपटने के तरीके एडवांस कोर्स में बताए जाएंगे।
कोर्स की कक्षाएं पांच सेशनों में चलेंगी और हर सेशन तीन घंटे का होगा। फाउंडेशन और एडवांस कोर्स का शुल्क 2000 रूपये निर्धारित किया गया है। आरटीआई कार्यकर्ता शैलेश गांधी और सूचना आयुक्त वीवी कुवलेकर छात्रों को इस कानून के विषय में जानकारी देंगे।

बच्चों की बहुआयामी योजना पर संकट के बादल

सरकार कानून और योजनाएं तो बहुत-सी बना देती है, लेकिन जब उनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो वह अक्सर असफल सिद्ध होती है। इसी कारण अनेक कल्याणकारी योजनाओं या तो अधर में अटक जाती हैं या अपना उद्देश्य पूरा किए बिना ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसी ही एक योजना है इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम जो खत्म होने की कगार पर है। सरकारी उपेक्षा के कारण बच्चों की इस बहुआयामी योजना पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
महिला और बाल विकास मंत्रालय ने इंटीग्रेटिड चाइल्ड प्रोटेक्शन स्कीम के क्रियान्वयन के लिए 90 करोड रूपये की मंजूरी दी थी। बच्चों के अधिकारों और पुनर्वास के लिए बनाई गई इस योजना के क्रियांवन के लिए हर राज्य में एक चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट के गठन का प्रावधान है। हर यूनिट एक एजेन्सी के समान कार्य करती है जिसमें पुलिस, राज्य, न्यायालय और गैर सरकारी संगठनों के सदस्य शामिल होते हैं, लेकिन अजीब विडंबना है कि अब किसी राज्य ने इस यूनिट का गठन नहीं किया है।
यह तथ्य सामने आए हैं महिला और बाल विकास मंत्रालय में दायर एक आरटीआई की अर्जी के जवाब से। एक एनजीओ के राज मंगल प्रसाद ने यह अर्जी दायर कर मंत्रालय से पूछा था कि कितने राज्य में चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट कार्य कर रही हैं। जवाब में मंत्रालय ने कहा है कि वह इस प्रकार की सूचनाओं के रिकार्ड्स नहीं रखता।

निदेशक की नियुक्ति में अनियमितता का खुलासा।

सूचना के कानून माध्यम से नियुक्तियों में हो रहीं धांधलियों के एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। इस कानून का इस्तेमाल करते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुणे की एक सरकारी परिवहन संस्था के निदेशक की नियुक्ति में हुई अनियमितताओं का खुलासा किया है।
दरअसल बाबा साहेब गोलांडे को पुणे महानगर परिवहन महामंडल लिमिटेड पीएमपीएमएल के प्रबंधन बोर्ड का निदेशक बनाया गया है। माना जा रहा है उन्होंने यह पद अपनी राजनैतिक पहुंच के चलते हासिल किया।
पी.एम.पी.एम.एल. पर आरोप है कि उसने निदेशक की नियुक्ति कर अपने ही चयन के मापदंडों का उल्लंघन किया है। इन अनियमितताओं का खुलासा आरटीआई कानून के तहत दायर एक अर्जी से हुआ है। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता विवेक वेलांकर, सुजीत पटवर्धन, जुगल रथी, संदीप खडदेकर, विजय कंभर और प्रशांत इमामदार द्वारा दायर की गई थी। अर्जी के जवाब में कहा गया कि निदेशक पद के लिए बाबा साहेब गोलांडे का नाम निगम आयुक्त प्रवीन सिंह परदेशी और दिलीप बंध ने प्रस्तावित किया था।
गौरतलब है कि निदेशक के पद के लिए पी एम पी एम एल ने एक विज्ञापन दिया था। विज्ञापन के 11 आवेदन प्राप्त हुए जिनमें 8 आवेदनों को उसी समय निरस्त कर दिया। मात्र तीन आवेदनों को ही निदेशक पद योग्य माना गया। और इन तीनों उम्मीदवारों में भी राजनैतिक पहुंच वाले को नियुक्त किया गया। अन्य उम्मीदवारों का न तो साक्षात्कार किया गया और न ही उनके आवेदन पर विचार किया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और शहरी विकास सचिव से इस मामले में दखल देने की मांग की है। साथ ही नियुक्त किए गए निदेशक को भी बर्खाश्त करने को कहा है।

सरकारी कर्मचारी आरटीआई के जरिए एसीआर लेने को स्वतंत्र- उच्च न्यायालय

हरियाणा और पंजाब उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा है कि सरकारी कर्मचारी सूचना के अधिकार के जरिए अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट अर्थात् एसीआर लेने के लिए स्वतंत्र हैं। यह निर्णय पंजाब सरकार की एक याचिका की सुनवाई पर दिया गया। इस याचिका में पंजाब सूचना आयोग के एक निर्णय को चुनौती दी गई थी।
पंजाब सरकार ने सूचना आयोग के 5 नवंबर 2007 में दिए गए निर्णय को चुनौती देने के लिए अदालत के समक्ष यह याचिका दायर की थी। राज्य सूचना आयोग ने अपने इस फैसले में पीडब्ल्यूडी को एक कर्मचारी की एसीआर दिखाने का निर्देश दिया था। आयोग ने अपने फैसले में विभाग को निर्देश दिया कि वह 1 अप्रैल 2000 से 31 मार्च 2006 तक की एसीआर की प्रतिलिपि 15 दिनों के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराए।
विभाग के अधिकारियों ने आवेदक द्वारा मांगी गई सूचनाओं को गोपनीय माना और कहा कि आरटीआई कानून की धारा 8 के तहत इस प्रकार की सूचनाएं नहीं दी जा सकती। विभाग ने आयोग के फैसले को चुनौती देने के लिए भारतीय संविधान की धारा 226 के अन्तर्गत न्यायालय में याचिका दायर की। लेकिन न्यायधीश एमएम कुमार और सबीना ने आयोग द्वारा दिए गए निर्णय पर सहमति जताई जिसमें कहा गया था कि किसी कर्मचारी को सूचना के अधिकार के माध्यम से एसीआर लेने से नहीं रोका जा सकता।

आरटीआई ने किया भविष्य निधि का रास्ता साफ

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के खुशीराम के लिए आरटीआई कानून वरदान साबित हुआ है। इस कानून के माध्यम से उनके दो साल से लटके पडे़ भविष्य निधि लेखा प्राप्त करने का रास्ता साफ हो गया है। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी खुशीराम रायपुर कलेक्ट्रेट से 2006 में सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद जब भविष्य निधि लेने की बारी आई तो उन्हें अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा। विभाग का कहना था कि उनके पीएफ अकांउट का विवरण उसके पास नहीं है। विभाग ने इसकी वजह अलग-अलग जगह उनके स्थानांतरण को बताया। कई बार उन्हें अपना काम करवाने के लिए घूस देने को भी कहा गया।
विभाग के अनेक चक्कर लगाने के बाद जब खुशीराम का काम नहीं हुआ तो उन्होंने कलेक्ट्रेट कार्यालय में आरटीआई दायर कर विभाग से इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा। अर्जी के जवाब में खुशीराम को पता चला कि रिटायरमेंट से पहले जिन दो विभागों में उनकी पोस्टिंग हुई थी, जहां से पीएफ लेखा विवरण प्राप्त नहीं हुआ है।
दरअसल भू अभिलेख कार्यालय और बलौदा बाजार तहसील कार्यालय में स्थानांतरण के दौरान कार्यालय ने उनके पीएफ लेखा की पर्ची कलेक्ट्रेट कार्यालय नहीं पहुंचाई थी जिस कारण उन्हें पीएफ लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। यह जानकारी मिलने के बाद खुशीराम ने इन दोनों विभागों से संपर्क किया और उनका पीएफ विवरण कलेक्ट्रेट कार्यालय भेजने को कहा। इन कार्यालयों से उनका पीएफ विवरण कलेक्ट्रेट कार्यालय भेज दिया गया और खुशीराम की दिक्कतें हल हो गईं।

आरटीआई के असर से बनने लगीं सड़कें

रायपुर के गरियाबंद क्षेत्र में आरटीआई ने सड़कों के निर्माण कार्य चालू करवाने में अहम भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र के कोसनी, फुलकाना और गजरा गांव में आपदा राहत के अन्तर्गत ग्राम पंचायत को सड़कें बनवानी थी, लेकिन यहां न तो सड़कें बनीं और जो सड़कें थीं, उन्हें भी बदतर हालात में पाया गया।
दरियाबंद के आशीष शर्मा ने इस मामले में पंचायतों से विवरण निकलवाने के लिए आरटीआई दायर की। इस आरटीआई का असर यह हुआ कि इन प्रस्तावित सड़कों का निर्माण कार्य शुरू हो गया। साथ ही अधिकारियों ने इसमें की गई धांधली के जांच के आदेश भी दे दिए हैं।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

भोपाल त्रासदी के अनसुलझे का जवाब सूचना के अधिकार से

आज से 20 साल पहले हुई मध्य प्रदेश के भोपाल में गैस त्रासदी में हजारों लोगों ने अपनी जान से हाथ धो बैढे थे। सैकड़ो लोग शारीरिक अक्षमता के शिकार हुए थे। लेकिन त्रासदी के संबंध में अनेक अनसुझने सवाल जस की तस बनी हुई है। यह त्रासदी भोपाल के यूनीयन कार्बाइड फेक्टरी में हुई थी। दुर्घटना के बाद सरकार ने बड़े-बडे़ वायदे किए थे। लेकिन राहत कार्य के लिए जो कुछ भी हुआ वह सब ऊॅंट के मुॅह मे जीरा साबित हुआ है। आज दो दशक बाद भी क्षतिपूर्ति, वास्तविका दोषी को सजा, स्वास्थय सुविधाएं आदि अनेक अनसुलझे सवाल है। जिसका जवाब लोग अब सूचना के अधिकार के माध्यम से बड़ी मात्रा में आवेदन कर मांग रहे है। त्रासदी के शिकार शारीरिक अक्षमता झेल रहे सूफीयान के अनुसार भोपाल की स्थिति आज भी अच्छी नहीं है, अब भी लोग उस भयानक त्रासदी के कारण लोग शारीरिक अक्षमता का शिकार हो रहे है। त्रासदी के एक अन्य शिकार रशिदा बाई का कहना है कि जो लोग इस त्रासदी के लिए दोषी है, उसके लिए वाजिब सजा का प्रावधान हो । साथ ही कहा कि इसके क्षतिपूर्ति, स्वास्थय व्यवस्था की जानी चाहिए। ऐसी दुखद कहानी सिर्फ सुफीयान या रशिदा बाई का नहीं है बल्कि अनेक उदाहरण देखे जा सकते है

कश्मीर में सूचना का अधिकार एक मजाक

कश्मीर में मानवाधिकार का हनन और मानव गुमशुदा एक आम समस्या है। लेकिन मानवाधिकार के हनन और गुमशुदा व्यक्तियों की जानकारी हासिल करना यहाॅ टेढ़ी खीर है। संपूर्ण भारत में सूचना का अधिकार के तहत मानवाधिकार से संबंधित सूचना उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन जम्मू कश्मीर ऐसी सूचना के लिए स्टेट सीक्रेट के अन्तर्गत रखा जाता है। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के अनुसार कश्मीर में सूचना का अधिकार एक मजाक बना कर रख दिया गया है। साथ ही कहा कि यहाॅ ऐसे जानकारी प्राप्त करने के लिए अन्य कोई प्रावधान भी नहीं है। ग्रोवर ने यह सब बात एसोसियसन आॅफ परेन्ट्स आॅफ डिसएपीएर्ड पर्सनस के द्वारा आयोजित के एक कार्यशाला में कही। साथ ही श्री मति ग्रोवर ने भारत सरकार पर आरोप लगाया कि वह यहाॅ सैन्य शासन स्थापित कर रखा और जबकि अन्तर्राष्ट्रीय फोरम में यहाॅ की एक खूबसूरत तस्वीर पेश की जाती है। श्री मति ग्रोवर ने गुमशुदा हुए लोगो के रिश्तेदारों को सलाह दिया कि वह आर्मी और अन्य सुरक्षा एजेन्सियों के खिलाफ शिकायत करें। साथ ही कहा कि इन्टरनेशनल फोरुम मंे भारत पर दवाब बनाने के लिए सुव्यवस्थित तरीका और गुमशुदा व्यक्तियों से ंसबंधित कागजी कार्यवाही करना आवश्यक है। भारत 11 साल पहले मानवाधिकार के हनन के मामने में अन्तर्राष्टीय समझौता में शामिल हुआ था। यह मामले पर पुनर्विचार नहीं हुआ । जिससे लगता है कि भारत सरकार ऐसे मामले के लिए कितना गंभीर है।

खर्चा रुपैया चर्चा चैवन्नी

सरकार सूचना के अधिकार कानून के लिए करोड़ों में खर्च करी है। लेकिन जम्मू कश्मीर को आम लोगों और सरकारी अधिकारियों के लिए आज भी एक सपना ही है। हाल में किए गए सर्वे के अनुसार जम्मू कश्मीर के आम लोग और सरकारी अधिकारी को भी इस कानून का अभाव है। सर्वे ने सूचना का अधिकार से संबंधित प्रश्न थे। स्थिति इनती डमाडोल दिखा कि जब सर्वे में जब एक स्वास्थय विभाग के निदेशक से प्रश्न पूछा गया। तो निदेशक ने प्रश्नों का जवाब निदेशक के निजी सहायक से पूछने को कहा। निजी सहायक ने इसे सेक्सन आॅफीसर को रेफर कर दिया। सेक्सन आॅफीसर से संपर्क करने पर उन्होंने कार्यकर्ता को प्रश्नों के जवाब के लिए दो दिन बाद आने को कहा। जब दो दिन बाद सेक्सन आॅफीसर से संपर्क किया गया तो कुछ घंटे इन्जार करने को कहा। लेकिन इसके बाद भी कार्यकर्ता को इस कानून के प्रश्नों से संबंधित जवाब नहीं मिला। यह कहानी अकेले निदेशक या निजी सहायक या सेक्सन आॅफीसर का नहीं है। बल्कि अनेक सरकारी अधिकारियों के है। जिन्हें राज्य सरकार की तरफ से इस कानून के लिए टेªनिंग भी दी गई है। गौरलतब है कि जम्मू कश्मीर में राज्य सूचना का अधिकार कानून 2004 है। जो केन्द्र के सूचना का अधिकार कानून 2005 के समान है।

काफी मशक्कत के बाद मिला आर.टी.आई., लेकिन......

भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सूचना का अधिकार 2005 जैसे कानून विकासशील देशों के लिए अति असरदार कानून है। यह बात संयुक्त राष्ट्र ने अपने हाल के एक रिपोर्ट में कही है। भारत एशिया और पेसीफिक के उन आठ देशों की श्रेणी में है जो जिसे सूचना का अधिकार जैसे कानून लागू किया है। यह कानून भ्रष्टाचार कम करने, जीवन स्तर सुधारने, जवाबदेह और पारदर्शिता के लिए मददगार है। साथ ही रिपोर्ट मे कहा गया है मुख्य रुप से भारत में यह कानून अधिक प्रभावी है। क्योंकि यहाॅ यह कानून अधिक शख्त है। साथ ही भारत में इस पर कई आंदोलन हो रहे है। और इस प्रगतिशील सूचना का अधिकार कानून सूचना और प्राद्योगिकी, ई. गर्वेनेस का उपयोग प्रशासन को पारदर्शी और जवाबदेह के लिए उपयोग कर रहे है। काफी मेहनत मशक्कत के बाद यह कानून भारत मंे लागू हो पाया है। जो भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह के लिए दवाब बनाया है। वर्तमान में सरकार ने सुझाव दिया है इस कानून में कुछ फेरबदल किया जाए। साथ ही कुछ सरकारी संस्थाओं, केबिनेट पेपर को इस कानून के दायरें से बाहर किया जाना चाहिए।

राप्ट्रपति भवन का सालाना बिजली बिल 4 करोड़ रुपये

सूचना का अधिकार अब ऐसी सूचनाओं पर संेध लगा रहा है जहाॅ तक किसी भी कानून की पहुॅच नहीं थी। जिसे अब तक कभी सुरक्षा तो कभी निजता का नाम पर रोका जाता था वह इस अधिकार के माध्यम से आम जनों में पहुॅच रहा है। राष्ट्रपति भवन का सालाना बिजली बिल करीब 4 करोड़ रुपये है। पिछले चार साल का सिर्फ राप्ट्रपति भवन का बिजली बिल 16.5 करोड़ रुपये है और प्रधानमंत्री आवास और उसके कार्यालय का बिजली बिल पिछले तीन सालों में 37.26 लाख रुपये आया है।
दिल्ली के एक व्यवसायी चेतन कोठारी के द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना के जवाब में यह जानकारी दी गई है। राप्ट्रपति भवन ने पिछले पांच सालों में लगभग तीन करोड़ बिजली यूनिट खर्च किया है और प्रधानमंत्री कार्यालय ने करीब सात लाख यूनिट बिजली का खर्च पिछले तीन सालों में की है। साथ ही जवाब में बताया है कि सिर्फ प्रधानमंत्री आवास के लिए कोई जेनेरेटर सुविधा नहीं है, जबकि जेनेरेटर सुविधा मुख्यतः सुरक्षा व्यवस्था, हर्टीक्लचर पंप और प्रधानमंत्री कार्यालय के आपात कालीन सेवा के लिए है। हालांकि राप्ट्रपति भवन के लिए दो जेनेरेटर 310 ज्ञट। का लगाया गया है। जबकि एक आंकड़े के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति बिजली का खर्च करीब 393 ज्ञॅभ् प्रति वर्ष है। और भारत के 66 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र बिजली के पहंुॅच के बाहर है और दुनिया के कुल बिजली के बिना रहने वाले जनसंख्या में अकेले 35 प्रतिशत भारत में रहते है। अर्जीकर्ता कोठारी ने गाॅधी जी तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने बिजली लाने के लिए बहुत प्रयास किए थे। साथ ही कहा कि हमारे देश में बिजली की बहुत किल्लत है।

ऊर्जा विभाग के कर्मचारियों के लिए वरदान बना आरटीआई

सूचना का अधिकार राजधानी के ऊर्जा विभाग के कर्मचारियों के लिए समस्याओं के निदान का अहम औजार बनता जा रहा है। दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड के कर्मचारियों ने इस कानून के तहत बडी संख्या में उसके प्रमोशन के संबंध जानकारियों के लिए अर्जियां दायर की हैं। कर्मचारी अपने प्रमोशन संबंधी विभिन्न गोपनीय समझे जाने वाले दस्तावेजों की जानकारी मांग की हैं। विभाग के अतिरिक्त जन सूचना अधिकारी मधु मालती का मानना है कि 99 प्रतिशत अर्जियां कर्मचारियों की प्रमोशन के जांच परीक्षा, अंक, योग्यता से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि यदि चार व्यक्ति टेस्ट देते हैं और उनमें से एक टेस्ट पास नहीं कर पाता या पाती तो वह आरटीआई के माध्यम से परिणाम और इसकी वजह जानना चाहता है। यही कारण है कि कर्मचारी गण बडी संख्या में इस कानून का इस्तेमाल कर रहे हैं।

सूचना के बदले मिली धमकी

सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांगने वालों को सूचना भलें ही ना मिलें लेकिन धमकी जरुर मिल जाती है। जन सूचना अधिकारियों के ऐसे कृत्य एक-दो नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। असम के नलवारी जिले के निवासी हितेशवार लाखर ने उसके गांव में हो रहे सरकारी कार्य की जानकारी के लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दिया था। लाखर को सूचना तो नहीं मिली लेकिन दो घमकी भरे काॅल जरुर मिल गए। लाखर एक लव स्नातक है और एक गैर सरकारी संस्था ‘‘ग्राम विकास मंच’’ के पूर्ण सदस्य के रुप में कार्य करते है । लाखर ने आवदेन के माध्यम से दो ग्राम पंचायत बाड़ीगोग और बानभाग मे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत हो रहे कार्यो का विवरण मांगा था। जिसमें योजना कार्य के भुगतान पंजी, जॉब कार्ड धारकों की सूची और अब तक किए गए कार्याे का मास्टर विवरण पंजी की नकल मांगी थी। कुछ दिन इन्तजार के बाद भी लाखर को कोई सूचना नहीं मिली। लेकिन उसके मोबाइल फोन और फिर लेण्ड लाइन फोन पर धमकी भरे कौल आ गए। साथ ही धमकी मे कहा था कि जल्द ही अपने आवेदन वापस ले लें वर्ना तुम्हें रात में उठा लिया जाएगा और ‘‘आवश्यक इलाज’’कर दी जाएगी। इसके बाद लाखर ने हार नहीं मानी और आवेदन को वापस नहीं लिया। साथ ही पास के पुलिस स्टेशन मे एक एफ.आई.आर दर्ज करा दी।

महाराष्ट्र में साल भर में 3 लाख से अधिक आर.टी.आई. आवेदन

सूचना का अधिकार का इस्तेमाल की संख्या काफी बढ़ी है और साथ-साथ इसकी पेंडिंग भी बढ़ रही है। हाल ही में एक आंकडे के अनुसार केवल मुंबई के राज्य सूचना आयोग में ठंडे बस्ते में पडे़ आवेदन और शिकायतों की संख्या करीब 3600 है। पूरे महाराष्ट्र के आंकडे़ पर यह संख्या करीब 16000 हजार है। इसके साथ ही महाराष्ट्र देश भर में सबसे अधिक इस कानून के तहत आवेदन दायर करता है। यह आवेदन राज्य भर के कई सरकारी विभागों में दाखिल किए गए थे। जिसे वहां से जवाब नहीं मिलने या असंतुष्ट सूचना मिलने का कारण राज्य सूचना आयोग से अपील की गई थी। इसमें अधिकाँश शिकायतें पेंशन, टाउन प्लानिंग, मुख्य मंत्री रिलीफ फंड के दुरुपयोग से संबंधित था। सूचना के अधिकार कार्यकर्ता शैलेष गांधी को मिले जवाब के अनुसार मुख्य मंत्री रिलीफ फंड का पैसा विप्पति के समय खर्च न कर उसका दुरुपयोग किया जाता है। साथ ही जाहिर किया कि फंड के पैसे किक्रेट मैच, फिल्म निर्माण जैसे वाणिज्यक कार्य पर खर्च किया जाता है। एक आंकडे़ के अनुसार महाराष्ट्र देश भर में सबसे अधिक आवेदन दाखिल करता है। राज्य भर के पिछले साल में करीब 3 लाख आवेदन दायर किए गए।

जीवन भर सेवा की, पर मिला छलावा

जीवन भर जिसकी सेवा की, उससे ही मिला छलावा। कुछ ऐसा ही वाक्या देखने को मिला एक शिक्षा के मंदिर में। झारखंड में रांची कॉलेज एक प्रतिष्ठित कॉलेज है। जिसके स्थापना के कुछ ही सालों बाद श्री बिन्देसर सिंह चपरासी के पद पर नियुक्त हुए थे। जिनको अक्तूबर 2007 सेवानिवृति में होनी थी। लेकिन कॉलेज प्रशासन के उसे अक्तूबर 2005 में ही सेवानिवृति दे दी। इसके बाद बिन्देसर ने इसका कारण जानना चाहा। इसके लिए उन्होंने कर्मचारी विवरण पंजी दिखानें की मांग की। इसके जवाब में कॉलेज प्रशासन ने उल्टे सीधे जवाब दिए साथ ही कहा कि उसकी सेवानृविति की आयु पूरी हो गई है। और उन्हें कर्मचारी पंजी नहीं दिखाया जा सकता। परेशान होकर बिन्देसर ने अपने कॉलेज के एक वकालत पढे़ छात्र की मदद से सूचना का अधिकार कानून का तहत आवेदन किया। जिसमें बिन्देसर ने कर्मचारी विवरण पंजी दिखाने की मांग की थी। इसके जवाब में कॉलेज प्रशासन ने पंजी दिखाई। जिसमें पाया गया कि प्रशासन ने कर्मचारी विवरण पंजी पर उनकी जन्म तिथि के साथ छेड़छाड़ की थी। अंततः बिन्देसर को उनके बचे सेवा काल के लिए नियुक्ति दे दी गई।

आर.आई.टी के तहत दी गई सूचना गलत एवं भ्रामक

अंबाला केन्ट के एक भूतपूर्व विधायक ने आरोप लगाया है कि उनके द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में गलत और भ्रामक सूचनाएं प्रदान की गईं हैं। उन्होंने यह आरोप अंबाला सरदार म्युनिसिपल काउंसिल के कार्यकारी सूचना अधिकारी पर लगाया है।
पूर्व विधायक अनिल विज ने अंबाला केन्ट के काम्प्लेक्स राय मार्किट के सर्वे नंबर 178 के एक प्लाॅट के संबंध में जानकारी मांगी थी। मिनरवा काम्प्लेक्स में बहुमंजिली इमारतों का पुनर्निर्माण करवाया गया था और इन्हें लाखों रूपये प्रतिमाह के किराए पर उठाया गया है। इसी पुर्ननिर्माण कार्य की जानकारी के संबंध में उन्होंने आरटीआई दायर की थी।
इस मुद्दे को निगम पार्षदों की एक बैठक में भी उठाया गया। बैठक में कार्यकारी अधिकारी ने कहा कि यदि आवेदक दी गई जानकारी से संतुष्ट नहीं है तो उसे ताजा आवेदन करना चाहिए जिसमें उसे अतिरिक्त सूचना प्रदान की जाएगी। इसके जवाब में सूचना कार्यकारी अधिकारी ने कहा कि अगर सूचना पूर्ण या संतुष्ट नहीं था तो उसे फिर से एक नया आवेदन करना पिछले सूचनाओं के साथ करना चाहिए।

शिक्षिका ने लगवाया एस.डी.एम. पर जुर्माना

पूर्वी दिल्ली के सुंदर नगरी की एक शिक्षिका ने एस।डी.एम. को अपना काम समय पर न करने के एवज में जुर्माना लगवाया है। गुरप्रीत कौर सुंदर नगरी की निवासी है जो बच्चों को टियुशन पढ़ाती है। टियुशन से प्राप्त होने वाली उसकी आय प्रति माह करीब 1500 रुपये है। आय के अन्य स्त्रोत भी नहीं है। उन्होंने अपना आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए अपने क्षेत्र के जिला अधिकारी कार्यालय में आवदेन किया। कार्यालय ने उनका आय प्रमाण पत्र 4000 रु प्रति माह का निर्गत किया। गुरप्रीत ने इसके खिलाफ जिला अधिकारी से शिकायत की। लेकिन बार-बार जिला अधिकारी कार्यालय के चक्कर लगाने के बाद भी उसके प्रमाण पत्र में कोई सुधार नहीं हुआ। परेशान होकर गुरप्रीत ने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दिया। उसके बाद आय के संबंध मंे जांच हुई और फिर जवाब आया। जिला अधिकारी कार्यालय से दिए गए जवाब से गुरप्रीत संतुष्ट नहीं हुई। अंततः गुरप्रीत ने केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील की। आयोग ने जांच के बाद एस.डी.एम. सह जन सूचना अधिकारी को आदेष दिया कि आवेदिका का आय प्रमाण उपयुक्त राषि और उपयुक्त समय सीमा में निर्गत करें। साथ ही सूचना देने के लापरवाही के जुर्म में एस.डी.एम. सह सूचना अधिकारी को 1750 रुपये का जुर्माना लगाया है ।

नर्मदा बांध का पानी गुजरात को केवल 7 प्रतिशत

नर्मदा घाटी विकास परियोजना से गुजरात राज्य को केवल पिछले साल केवल 7 प्रतिशत पानी मिला। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई के जवाब में सामने आया है। इस कानून के तहत यह आवेदन दिल्ली के एक पर्यावरण समूह सभा के द्वारा केन्द्रीय जल आयोग से मांगा गया था। यह 45000 करोड़ की लागत की परियोजना मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के लिए एक संयुक्त परियोजना है। जिसमें अनेक छोटे-बडे़ बांध है। यह भारत का सबसे बड़ा संयुक्त परियोजना है। साथ ही इसके सरदार सरोवर बांध मुख्यतः गुजरात मे पानी आपूर्ति के लिए निर्माण किया गया है। जो गुजरात के सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात के लिए है। गौरलतब है कि परियोजना से करीब 20 लाख हेक्टेयर जमीन कि सिंचाई और करीब 1450 किलोवाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही इसके लिए मध्य प्रदेश को लगभग 50 हजार परिवार इस परियोजना के निर्माण के लिए विस्थापित हुआ था। मांगी गई सूचना के जवाब में पाया गया है कि वर्ष 2007 में 19.91 मिलियन क्यूबीट मीटर पानी परियोजना के बांधो से प्रवाह हुआ लेकिन गुजरात राज्य को केवल 1.285 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी सिंचाई, उद्योगिकी उपयोग और अन्य कार्यों के लिए मिल पाया है। एक इंजिनियर हिंमाशू खक्खर के अनुसार गुजरात राज्य ने बहुत ही कम जल का उपयोग कर पाया है क्योंकि राज्य ने अभी तक अपने केनल नेटवर्क को दुरुस्त नहीं किया है। यह केनल लगभग पूरे राज्य में पानी का प्रवाह करता है।

गैर जिम्मेदाराना हरकत पर कसरत कैसे हो

एक तरफ बच्चों की जान ली जा रही होती है और दूसरे तरफ जवाबदेह अधिकारी अपने कार्यालय से नरारद रहते है। ऐसे गैर जिम्मेदारना हरकत के पारदर्शिता के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग से उसके अधिकारियों के टूर डिटेल की मांग की गई थी। जिसे रा.म.आ. ने खारिज कर दिया। यह जानकारी एक सेवानिवृत कोमोडोर लोकेश बत्रा के द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई थी। आवेदन खारिज के पक्ष में आयोग ने दलील दी कि मांगी गई सूचना बेकार है और इसका जनहित से कोई संबंध नहीं है। यह जवाब रा.म.आ. ने आवदेन के पांच महीने बाद दिया। गौरतलब है कि इस कानून के तहत अधिकारी को 30 दिनों के अंदर जवाब देना होता है। जबकि महिला आयोग के जवाब से तीन महीने पहले ही केन्द्रीय सूचना आयोग ने इस मामले में अपने हाथ बढ़ा दिए थे। साथ ही केन्द्रीय सूचना आयोग ने कहा कि मामले में रा.म.आ. की लापरवाही दिखती है। लोकेश ने अनुसार वर्ष 2005 में भी उन्होंने इससे संबंधित शिकायत पत्र भेजा था। जब नोएडा गांव से छः बच्चे गायब हो गए थे। लेकिन उस समय भी उसे कोई जवाब नहीं दिया गया था। साथ ही कहा कि अगर अधिकारियों ने उस समय अपनी सक्रियता दिखाई होती तो कई निर्दोष बच्चों की जान बच सकती थी। इससे पूर्व भी इससे मिलते-जुलते एक शिकायत के निर्णय में अधिकारियों के निजी सूचना ‘‘छुट्टियों की सूची’’ इस कानून के तहत दी गई थी। यह मामला केन्द्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला से संबंधित था।

विकास कार्य कागज पर हकीकत पर नहीं

वैलोर के एक पंचायत में सिर्फ कागज पर विकास कार्य के आंकडें का खुलासा हुआ है। यह खुलासा वेलौर के एक ग्राम पंचायत पर हकीकत से परे कागज पर किया गया काम सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई विकास कार्य के रिपोर्ट के तहत जवाब के तहत हुआ है। पालवली पंचायत की एक ग्रामीण पी। एस. बाला सुब्रमण्यम के द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई विकास कार्य के तहत से खुलासा हुआ है। जवाब के कागज के अनुसार करीब 20 लाख रुपये के पन्द्रह काम जिसमें खेल के मैदान का निर्माण, पुस्तकालय का निर्माण, रोड आदि का निर्माण के आंकडें थे जिसका कि हकीकत में निर्माण अभी तक नहीं हो पाया था। इसके अलावे सरकारी कागजों में 263 मीटर तार रोड पूरा करने की बात कही गई थी जो वास्तव में तार से बना ही नहीं था। इसके अलावे कागज पर मौजूद 28 प्रकाश स्तंभों में केवल 15 प्रकाश स्संभ का ही निर्माण किया गया था।



भारत का मुख्य न्यायाधीष सूचना के अधिकार दायरे में

केन्द्रीय सूचना आयोग ने यह इच्छा जताई है कि भारत का मुख्य न्यायाधीश भी सूचना के अधिकार के दायरे में आना चाहिए। इसके लिए केन्द्रीय सूचना आयोग ने फैसला लिया है कि इसके लिए एक पूर्ण बेंच सुनवाई की जाएगी।
आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त श्री वज़ाहत हबीबुल्ला ने कहा कि हमें भारत के मुख्य न्यायाधीश के निर्णय से संबंधित दो शिकायतें मिली है। आयोग जल्द ही इस दोनों शिकायतों पर बेंच की सुनवाई करेगा और हमें आशा है कि हम इसे बिना किसी व्यवधान के लागू कराने में समर्थ होंगे। यह समस्या ऐसे समय में आ रही है जब मुख्य न्यायाधीश की साख गिर रही है। पिछले निर्णयो के देखते हुए एक अखबार में आये खबर के आधार पर सुभाष सी अग्रवाल और सी रमेश ने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दाखिल किया था। जिसमें अग्रवाल ने पूछा था कि क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्यों के मुख्य न्यायाधीश सूचना के अधिकार के अन्र्तगत आते है ? इस अपील को सर्वप्रथम कानून और न्याय विभाग को भेजा गया था जहाॅ से इसे पर्सनल और ट्रेनिंग विभाग को भेज दिया गया था लेकिन कही से भी सफलता नहीं मिलने के बाद श्री अग्रवाल ने केन्द्रीय सूचना आयोग में आवेदन की थी। श्री हबीबुल्ला ने कहा कि वर्तमान में यह विवाद का विषय है। कि क्या भारत का मुख्य न्यायाधीश संविधानिक प्राधिकरण है? क्या किसी एक व्यक्ति का निर्णय भी इस कानून के दायरे से बाहर हो सकता है? भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि भा. मु. न्य. एक संविधानिक प्राधिकरण है। और संविधानिक प्राधिकरण सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आता है साथ ही उसके बाद में व्यक्तव में कहा कि अगर वह सरकारी अधिकारी होता तो यह विवाद का विषय हो सकता था। साथ ही एक संसदीय समिति के अनुसार सभी संविधानिक प्राधिकरणों के इस दायरे में आना चाहिए। साथ ही कहा कि सूचना के अधिकार के खंड 2 में बताया गया हैं।इसके दायरे में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका भी आती है और इसके अनुसार भारत का मुख्य न्यायधीश और राज्यों के मुख्य न्यायधीशों भी इस कानून के दायरे में आते है।

केन्द्रीय सूचना आयोग ने यू.पी.एस.सी का सुझाव

केन्द्रीय सूचना आयोग ने संघ लोक सेवा आयोग को सुझाव दिया है वह उन आरटीआई आवेदकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे जो सिविल सेवा की परीक्षाओं में नकली दस्तावेज जमा करते हैं। यह सुझाव मुख्य सूचना आयुक्त हबीबुल्ला वजाहत ने एक मामले की सुनवाई बाद दिया।
दरअसल लखनऊ के सत्य नारायण शुक्ला ने 2006 में एक आरटीआई दायर की थी, जिसमें सिविल सेवा की परीक्षा में चयनित अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछडा वर्ग के उम्मीदवारों के नाम, पते, पिता का नाम, पद तथा परीक्षा में प्राप्त अंकों का विवरण देने को कहा गया था। साथ ही यह भी पूछा गया कि सामान्य वर्ग के उन उम्मीदवारों के नाम और पते बताएं जिनके अंक आरक्षित वर्ग से अधिक थे, लेकिन उनका चयन नहीं हो सका।
इसके जवाब में संघ लोक सेवा आयोग ने कहा है कि ऐसी असंगत सूचना नहीं दी जा सकती। आयोग उम्मीदवारों के माता-पिता के पेशा का डाटा नहीं रखा जाता है। साथ ही आयोग ने कहा कि सामान्य वर्ग के संबंध में ऐसे सूचना नहीं दी जा सकती ।

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

बंगलौर इन्टरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड अब आर.टी.आई दायरे में

करनाटक में सूचना के अधिकार का दायरा बढ़ता ही जा रहा है। पूर्ण सरकारी उपक्रम ही नहीं आंशिक सहायता प्राप्त निजी संस्थान भी इसके दायरे में आने लगे है। कर्नाटक सूचना आयोग ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बंगलौर इन्टरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड सूचना के अधिकार के दायरे में आता है।
बंगलौर इन्टरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड से संबंधित एक निर्णय में कर्नाटक सूचना आयोग ने एक आदेश में कहा है कि बी.आई.ए.एल. को लोक प्राधिकरण माना जाए। क्योंकि इसे राज्य सरकार व केन्द्र सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है। यह निर्णय एक बंगलौर निवासी बेनसेन इसाक के द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना कि क्या बी.आई.ए.एल. इस कानून के दायरे में आता है ? के जवाब में आया है।
आयुक्त ने बी.आई.ए.एल को निजी व सरकारी साझेदारी का बताते हुए कहा कि इसे भारत सरकार के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अधिनियम 1971 के तहत वित्तीय सहायता दी जाती है।
गौरतलब है सूचना के अधिकार कानून या अन्य किसी कानून में आंशिक रुप से वित्त पोषित की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है। संभवतः यह इस कानून के इस्तेमाल से समय के साथ साथ स्वतः इससे संबंधित मामलों में न्यायालय के फैसलों से स्पष्ट हो सकेगी।
आयोग ने एक विश्लेषण में बताया कि कर्नाटक स्टेट इन्ड्रस्टियल इन्वेस्टमेंट एण्ड डेवलपमेंट कारपोरेशन ;के.एस.आई.आई.डी.सी.द्ध के द्वारा बी आई ए एल को सीधे धन दिया जाता है जो कि निजी शेयर होल्डर से अधिक है। साथ ही आयोग ने बताया कि बी.आई.ए.एल. का कुल निवेश 434.94 करोड़ है जिसमें 350 करोड़ रुपए ऋण के रुप में स्टेट सपोर्ट कमिटी द्वारा दिया गया है जो के.एस.आई.आई.डी.सी के सहयोग से चलता है। साथ ही राज्य सरकार ने अप्रत्यक्ष रुप से बी.आई.ए.सी. का इन्टी टेक्स, प्रोपटी टेक्स को पंाच साल के लिए छूट दे रखी है। साथ ही लीज की जमीन, स्टांम ड्यूटी, राजिस्टन आदि पर भी छूट दी गई है। इसके अलावा आयोग ने बी.आई.ए.एल को आदेश दिया कि श्री इसाक द्वारा मांगी गई सूचना का जवाब नियत समय में उपलब्ध कराए।

सूचना के अधिकार के सषक्तिकरण के लिए 300 करोड़ की मंजूरी

सूचना का अधिकार के अधिक से अधिक इस्तेमाल और सरकारी कामकाज के पादर्शिता के लिए केन्द्र सरकार ने देश में सूचना के अधिकार के सशक्तिकरण के लिए के लिए केन्द्र सरकार ने 12 वीं पंचवर्षीय योजना में 300 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है। यह राशि सूचना के अधिकार प्रचार-प्रसार के अलावा कार्यालय निर्माण और इस अधिकार के इस्तेमाल के प्रशिक्षण में खर्च की जाएगी। ताकि अधिक से अधिक लोग इस कानून का समझ सकें और इसका इस्तेमाल कर सकें।
यह राशि देश भर के 27 राज्यों के सूचना आयोगों के लिए है। जिसे अगले चार साल में वर्तमान राजकोषीय वर्ष से वर्ष 2011-12 के फिस्कल वर्ष में खर्च किया जाएगा। इस राशि में करीब 215 करोड़ रुपये आयोगों के भवन निर्माण, श्रम शक्ति निर्माण आदि के लिए कार्य, विभागों के आधनिकीकरण, कम्प्यूटीकरण के लिए खर्च होगा। साथ ही स्टेक होल्डर की ट्रेनिंग के लिए 53 करोड़, जागरुकता अभियान के लिए 30 करोड़, और शिक्षा के लिए 3.35 करोड़ रुपये खर्च किए जाने है। और करीब 30 करोड़ की राशि जागरुकता अभियान मीडिया कवरेज के लिए किया जाएगा। अक्तूवर 2007 में आयोजित केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग के द्वितीय राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा गया था कि राज्य आयोगों को राज्यों से उसे वित्तीय सहायता का अभाव है। यसवंतराव एकाडेमी ऑफ़ डेवलोपमेंट एडमिनिसट्रेसन, पुणे और नेशनल इम्पलीमेंटेशन एजेंसी फार केपेसिटी बिल्डिंग जो कि भारत और संयुक्त राष्ट संघ की पहल के अन्तर्गत 25,74,200 स्टेक होल्डर को सूचना के अधिकार के प्रचार-प्रसार के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी। यह कार्यक्रम केन्द्रीय सूचना अधिकारियों, राज्य सूचना अधिकरियों, अपीलीय अधिकारी, सरकारी अधिकारी, गैर सरकारी अधिकारी के प्रमुख, सूचना आयोग के कर्मचारी आदि आदि के ट्रेनिंग में मदद मिलेगी। इसके अन्र्तगत हर एक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश के हर जिले से करीब 1500 व्यक्तियों और का टेंªड किया जाएगा और दूसरे वर्ष में दो-दो जिले और अगले दो सालों में चार-चार जिले में किया जाएगा। साथ ही केन्द्र सरकार ने प्रस्ताव दिया है सूचना के अधिकार को एन.सी.ई.आर.टी और एस.सी. ई. आर. टी. के पाठ्यक्रम में विषय या एक अध्याय के रुप में शामिल की जानी चाहिए।

निजता के अन्तर्गत है बैंकों का लेन-देन

सूचना के अधिकार के तहत कैसी सूचना नहीं दी जा सकती इसकी तस्वीर साफ होती जा रही है। केन्द्रीय सूचना आयोग ने एक निर्णय में कहा कि सूचना के अधिकार के तहत किसी बैंक से लेन-देन की सूचना नहीं दी जा सकती। आयोग ने यह निर्णय फर्म ‘‘मंगल दास एण्ड ब्रदर प्राइवेट लिमिटेड’’ द्वारा इस कानून के तहत मांगी गई सूचना के जवाब में दिया है। मंगल दास फर्म ने इस कानून के तहत ‘‘अरोदया सिपिंग एण्ड वीविंग कंपनी लिमिटेड’’ के प्रोपर्टी मोर्टगेज के डीड की नकल भारतीय स्टेट बैंक से मांग की थी। मंगल दास फर्म द्वारा किए गए अपील में भी जिसमें आयोग से मिलता-जुलता जवाब दिया गया था। साथ ही कहा गया था कि ऐसी सूचनाएं बिना जन हित के देना निजता का हनन होगा। स्टेट बैंक अधिकारी के अनुसार सिंपिंग कंपनी द्वारा जमा मोर्टगेज डीड उसके निजी है। इसकी जानकारी किसी अन्य को देना मोर्टगेजर और मोर्टगेजी दोनों के हित में नहीं है। साथ ही कहा कि इस तरह की सूचनाएं बैंक ग्राहक की निजी होनी चाहिए। साथ ही बैंक अधिकारी ने कहा कि यदि आप जमीन के वास्तविक मालिक हैं तो भी ऐसी जानकारी इस कानून के तहत नहीं दी जा सकती। ऐसी सूचना उप-रजिस्टार कार्यालय से ली जा सकती है।

बुधवार, 2 जुलाई 2008

Schools bankroll parties- ‘Gifts’ flow from Delhi schools to Congress, BJP



ANANYA SENGUPTA

Watch it, moms and dads, while you shell out big bucks to get your kids into Delhi public schools! Chances are the cash you are “donating” to the students’ welfare fund is going someplace else.
A plea filed by a social activist under the Right to Information Act has revealed that public schools in the capital have been making donations to political parties, possibly to court favour with them.
According to documents available with The Telegraph, the Congress treasury swelled by nearly Rs 3 lakh in the financial year 2005-06 and the BJP’s by Rs 75 lakh in 2006-07, thanks to “gifts” from public schools.
The information was revealed to Afroz Alam Sahil, who had sought a report on donations above Rs 20,000 received by parties. Sahil said he had the records only for the two parties and the list could be longer if other parties were scrutinised.
Two public schools have issued cheques with a c/ in the name of state education minister Arwinder Singh Lovely.
The money routed through Lovely shows in the Congress account.
These are St Lawrence Convent and Sai Memorial Educational Society, which have paid Rs 51,000 (cheque No. 144390, UTI Bank) and Rs 75,000 (cheque No. 099701, Indian Bank) respectively.
Lovely, however, said: “Party sympathisers pay donations. No public school pays donation to political parties. There is a difference between donating to a relief fund and donating to a political party. During a crisis, many schools and other organisations pay to the party’s relief fund of their own accord.”
But S.L. Jain, chairman, National Progressive School Conference, which has all public schools in the country under its ambit, was aghast.
“I am shocked. This is highly irregular. Public schools are not supposed to issue any cheques to anyone --- political parties or otherwise. If there is an emergency in the country, we do raise funds, but that is done after a proper circular is issued by the schools informing the parents.”
Jain said the money raised was then handed over to the chief minister’s relief fund or whichever credible fund had been set up for the crisis.
“No school can decide on its own to donate to relief funds or issue cheques to political parties. This is entirely unethical. One can easily guess why these schools need political patronage,” he said, pointing out that the schools were not among the most sought after in the capital.
Sources said the schools might be topping up party coffers to extract benefits such as land for expansion and to generally keep themselves out of trouble.
Other Delhi schools that have made payments to the Congress are:
a) Sarvodaya Modern School, which has paid Rs 31,000 (cheque No. 001719, HDFC Bank, New Delhi);
b) Bharti Public School c/ Ramesh Pandit, which has paid Rs 25,000 (cheque No. 011821, Canara Bank);
c) Little Flower Public School c/ Ishwant Singh, which has paid Rs 21,000 (cheque No. 340014, Syndicate Bank);
d) Principal, Kalka Public School, which has paid Rs 50,000 (cheque No. 774051, Bank of Punjab Ltd);
e) Kala Niketan Bal Vidhyalaya, which has paid Rs 31,000 (cheque No. 245651, Central Bank).
The Rs 75-lakh donation to the BJP has been made by a single school --- Akik Education Centre (P) Ltd. The payments are by draft, six of them for Rs 9 lakh and three for Rs 7 lakh.
The numbers of the drafts for Rs 9 lakh are 601394, 601395, 601090, 601091, 601223 and 601219. Those of the Rs 7-lakh drafts are 601393, 601092 and 601218.
All nine drafts give the same address for the school -- 88 Baldev Park, Shahdara (east Delhi) – but each has a different pin code: from 110032 through 110040.
A visit to the address revealed a three-storey building that didn’t have a sign giving the school’s name.
Subodh Kumar, who said he was the owner of the house and was in the construction business, refused to give details about the school. He said his elder brother ran the school and would be able to answer questions about any donations, but added that he was away on vacation.
The school is not registered with the Central Board of Secondary Education, Council for the Indian School Certificate Examinations or the Delhi state board, as their websites show. Jain said it could be a centre for private coaching.
None of the other schools or the political parties would comment on the donations or say what the money was being used for. Many of the schools said no official was present since classes were closed for the summer vacation.
BJP spokesperson Rajiv Pratap Rudy expressed surprise that such payments were being made.
“I am very surprised and unable to understand how and on what pretext an educational institute would issue cheques to political parties,” he said. “This is akin to running a business in the name of education. To the best of my knowledge, I don’t recall our party getting such cheques.”


मंगलवार, 1 जुलाई 2008

आख़िर क्या है चंदे का फंदा......?


यह आंकडे कांग्रेस व भाजपा को हर साल मिलने वाले उस चंदे का है जो पाँच लाख से ऊपर के चंदा देने वालों ने दिया है। इसके अलावा लाखों में चंदा देने वालों की तादाद इतनी बडी है कि उसे इस ब्लॉग पर दिखा पाना मेरे लिए लगभग असंभव है।
अगर आप में से किसी भाई को यह लिस्ट देखनी है तो आप इस ब्लॉग के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं या फिर हमें +91-9891322178 पर फ़ोन भी कर सकते हैं या फिर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए निर्वाचन आयोग से भी हासिल कर सकते हैं। वैसे मुझे आपके कॉमेंट्स का इंतज़ार रहेगा.......

Political bet? Parties get biggest financial helping from firms

Political analysts and activists said such disclosures by the Election Commission, even if forced by RTI, can be a step towards accountability

Khushboo Narayan

India's two biggest political parties, the Congress and the Bharatiya Janata Party (BJP), received at least Rs104 crore in officially disclosed contributions between 2004 and 2007, largely from well-known companies.
Almost a third of this amount came in 2004-05, the last year in which national elections were held.
Contributions are expected to soar in 2008-09 in the run-up to elections, officially due sometime in early 2009.
India's Election Commission provided the information on contributions, or donations as they are dubbed, to Parivartan, an activist group that had filed a right to information, or RTI, application seeking a report on single contributions of more than Rs20,000 to political parties during these years.
The disclosure sheds some light on what has been and continues to be a grey area in the Indian electoral system. Unlike in the US, where parties and candidates have to disclose funding sources, the financing of Indian parties and politicians has always been a secretive affair. Not all companies and other contributors funding the parties disclose details of this; nor do all recipients.
Sometimes, the funding is in kind, through the use of aircraft, vehicles, guest houses or other infrastructure. It is widely acknowledged that significant amounts of cash are donated and deployed by most politicians and political parties in India, much of which is never accounted for.
According to the Election Commission, the Aditya Birla Group, an industrial conglomerate, was the largest donor to any political party between April 2006 and March 2007. It gave Rs10 crore to the Congress, the dominant party in the ruling United Progressive Alliance government.

Pharmaceuticals giant Ranbaxy Laboratories Ltd was the next biggest donor for the Congress in that year, giving Rs40 lakh.
A spokesperson of the Aditya Birla Group simply said: "The group has a general electoral trust, which is administered by highly reputed people such as Julio Ribeiro (former director general of Punjab Police and governor of Jammu and Kashmir), Tarjani Vakil (a finance professional) and E.B. Desai (a legal luminary). The trust is managed independently."
A Ranbaxy executive said the company's annual report mentioned that it has donated Rs40 lakh each to the Shiromani Akali Dal and Punjab Pradesh Congress.
For the current main opposition, or the BJP, the biggest donors were Noida-based Jubilant Enpro Pvt. Ltd and Kamaljeet Singh Ahluwalia, with contributions of Rs50 lakh each.
In the previous year, from April 2005 to March 2006, Videocon International Ltd contributed Rs3 crore to the Congress party, while the biggest donor for the BJP was Akik Education Centre, which gave Rs75 lakh. Details on Ahluwalia and Akik Education Centre were not immediately available.
An email sent to Jubilant Enpro did not elicit any response and its spokesperson was travelling. Videocon group chairman Venugopal Dhoot declined to comment. Some promoters of Jubilant are significant shareholders in HT Media Ltd, which publishes Mint.
Political analysts and activists said such disclosures by the Election Commission, even if forced by RTI, can be a step towards accountability even if these official sums are likely to be a fraction of total contributions, most of which remain unreported and unaccounted.
"Many companies give their funding clandestinely," notes Jaiprakash Narayan, national coordinator of Loksatta, an activist group that works in the area of political reform. "These firms don't want to be seen funding a political party and political parties don't want money that is accounted for because the real electoral expenditure is no longer legitimate. We need to make the pain of unaccounted donations so great that no entrepreneur will take the risk to do it."

Even with this list, many contributors' identities remain unclear. For instance, in 2003-04, when the Congress was the opposition party, it received Rs5 lakh from an entity simply listed as "National Growth".
The biggest donations for both parties naturally came in an election year, 2004-05. The BJP, then the dominant constituent of the ruling National Democratic Alliance, saw its treasury swell by about Rs34 crore from contributions. The Congress received Rs32 crore.
"Official donations are not necessarily voluntary donations. As 2004 was the election year, both parties must have gone to business houses seeking donations rigorously," said psephologist and Mint columnist G.V.L Narasimha Rao. "You can expect a spurt in donations this year due to the elections ahead."
In other years, the contributions are usually more modest.
In 2003-04, the BJP received at least Rs11 crore while the Congress managed Rs2.35 crore. In 2005-06, the Congress received Rs6 crore, against BJP's Rs3 crore. The Congress doubled its collection to Rs12 crore the following year, while the BJP received Rs4 crore.
Over the years, there have been some regular contributors, some of which have given money to both the Congress and the BJP.
For instance, between 2003 and 2007, the biggest contributor has been the Aditya Birla Group through its General Electoral Trust. The trust has contributed Rs21.71 crore to the Congress in this period and Rs3.16 crore to the BJP. Other significant contributors include the Vedanta group, either through its Indian subsidiary Sterlite Industries (India) Ltd, or a trust run by this subsidiary, the Public and Political Awareness Trust. Vedanta's contribution between 2003 and 2007 has been Rs10.5 crore.
Of this, Rs1 crore has gone to the Congress and Rs9.5 crore to the BJP.
An email sent to the Vedanta group did not elicit any response.
Other donors include the Tata group through its Electoral Trust (it gave money only in 2004-05, and to both parties), Jindal Steel and Power Ltd (which gave money to both parties in 2003-04) and Bajaj Auto Ltd, which gave money to the BJP in 2003-04 and the Congress in 2004-05.

India's biggest company by market capitalization, Reliance Industries Ltd, is missing from the list, as is any company that is part of the Reliance-Anil Dhirubhai Ambani Group (R-Adag).
Also missing are all of India's large software services firms, Infosys Technologies Ltd, Wipro Ltd and Satyam Computer Services Ltd (the largest, Tata Consultancy Services Ltd, is part of the Tata group).
RTI activist Arvind Kejriwal said he hoped the disclosure on corporate donations through RTI would empower people to draw linkages and question favours granted to companies by political parties.
"This transparency will force political parties not to be blatant in favouring these business houses," added Kejriwal, who won the Ramon Magsaysay award in 2006 for his work in transparency in governance through RTI.