गुरुवार, 15 जनवरी 2009

भारत में स्वास्थ व्यस्था: एक विचारणीय प्रश्न







अफ़रोज़ आलम ‘साहिल’
"हम इतनी परेशानियों के बावजूद दिल्ली आकर इलाज करा रहे हैं। यहाँ फ़ुटपाथ पर रहकर महीनों अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं। पर पता नहीं हमारा नम्बर कब आएगा.... पता नहीं हमारे राज्य में एम्स जैसा अस्पताल कब बनेगा...."

ये कथन सिर्फ बिहार के हेमलता देवी की ही नहीं, बल्कि एम्स के परिसर में घुसते ही वहाँ इलाज कराने आए सैकड़ों लोगों से ऐसी कितनी ही बातें सुनने को मिल जाती हैं।
यह एक बड़ा दर्दनाक प्रश्न है। न जाने कितने मरीजों को अपनी बारी का इंतज़ार करते- करते अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है, या फिर किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर अपने घर तक को गिरवी रखना पड़ जाता है.... पर इस प्रशन का उत्तर न सरकार के पास है और इस एम्स प्रशासन के पास। बल्कि एम्स का तो यह कहना है कि बेडो की कमी के कारण मरीज़ो को एक साल से अधिक भी इंतज़ार करना पड़ सकता है। मरीज़ो को बेड इस हालत में मिलेगा जब वो सीरियस कंडीशन में हो। यही नहीं, एम्स से निराश हो कर लौटने वालों का कोई भी आंकड़ा एम्स प्रशासन के नहीं है। पर सच मानिए.... ऐसे लोगों की संख्या एक साल में लाखों व करोड़ो में होगी।


खैर गलती एम्स प्रशासन की भी नहीं। आखिर वो वह कर ही क्या सकते हैं। जब बेड ही नहीं तो कहां से मरीज़ों की भर्ती करें। आखिर 1038 (एक हज़ार अड़तीस) बेड ही तो है उनके पास। उनमें से भी नेताओं, मंत्रियों व पारिवारिक रिश्तेदारों की पैरवी,सिफारिश या जुगाड़ अलग से। सच पूछे तो दिल्ली के विभिन्न सरकारी अस्पतालों के प्राइवेट वॉर्डों के करीब 500 बेड वीआइपी मरीजों के लिए ही हैं। यहां बिना किसी ऊंची सिफारिश के मरीजों का भर्ती होना मुश्किल है। एम्स के प्राइवेट वॉर्डों में करीब 216 कमरे हैं। सेमी डीलक्स कमरे का किराया 1,200 रुपये और डीलक्स का किराया 1,800 रुपये प्रतिदिन है।

जी....! देश के सबसे बड़े व गरीबों के इकलौता एम्स में कुल बेडों की संख्या सिर्फ 1038 है। जिनमें 861 बेड जनरल वार्ड के हैं और 177 बेड प्राईवेट वार्ड के। यह जानकारी स्वयं एम्स ने “ सूचना के अधिकार ” के तहत दिए गए एक आवेदन के उत्तर में दिया है। (नोट:- किस विभाग में कितने बेड उपलब्ध हैं, इसकी सूची भी आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर इसी पोस्ट के साथ मौजूद है।)

54611 मरीज़ दिनांक 01 जनवरी 2007 से 31 अक़्तुबर 2008 तक की अवधि में इलाज के लिए एम्स में भर्ती किए गए।

5270 मरीज़ दिनांक 01 अक़्तुबर 2008 से 31 अक़्तुबर 2008 तक की अवधि में इलाज के लिए भर्ती किए गए।

वर्ष 2007 में एम्स ओ।पी.डी. में कुल 1281802 मरीज़ों ने “Inpatient treatment” लिया, वहीं वर्ष 2008 में यह संख्या 65755 रही।

एम्स में इलाज की दरकार हज़ारों को होती है और यही वजह है कि लोगों को इलाज के लिए अपनी बारी आने का महीनों इंतज़ार करना पड़ता है। ऐसे में सबसे बेहतर विकल्प तो यह है कि लोगों को उनके क्षेत्रीय मुख्यालयों या राज्यों में ही एम्स जैसी सुविधाओं वाले अस्पताल मुहैया कराए जाएँ। एम्स के प्रांगण में अपने इलाज का इंतज़ार कर रहे लोगों को शायद असली इंतज़ार तो उस दिन का है, जब लोगों को उनके क्षेत्रों में ही एम्स जैसा इलाज मिल सकेगा। पर पता नहीं, लोगों का यह इंतज़ार कब पूरा होगा।

हालांकि पिछली केंद्र सरकार ने लोगों की इस ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए एक योजना बनाई थी जिसके तहत भारत के उत्तरी राज्यों ख़ासकर बिहार, राजस्थान, पूर्वोत्तर, उत्तर प्रदेश आदि में क़रीब छह एम्स जैसे अस्पताल बनाने की मंशा ज़ाहिर की थी। पटना सहित कुछ अन्य स्थानों पर शिलान्यास भी कर दिया गया था पर अभी तक अस्पताल तो दूर, कोई भवन तक नज़र नहीं आ रहा है।
यह एक बहुत बड़ा सवाल है। पर इस सवाल पर हमारी सरकार व मीडिया दोनों की ही नजर नहीं जाती है। आखिर क्यों....?

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