रविवार, 10 अगस्त 2008

जनता का पैसा उड़ाते जनसेवक

हिमांशु शेखर
एक दौर वह था जब राजनीति को सेवा का जरिया माना जाता था। आजादी के पहले और आजादी के कुछ साल बाद तक सियासत और सेवा एक-दूसरे के पर्याय सरीखे ही थे। सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले लोग ही राजनीति के रथ पर सवार होते थे और जनसेवा को ही अपने जीवन का अहम मकसद मानते हुए राजकाज में हिस्सा लेते थे। कम से कम खर्चे में चुनाव में विजयी पताका पफहराने को बडे़ सम्मान की निगाह से देखा जाता था। पर अब हालात कापफी बदल गए हैं। जो चीजें कभी राजनीति में अछूत मानी जाती थीं, दुर्भाग्य से आज वही अनिवार्य बना दी गई हैं। चुनाव प्रचार में ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करना राजनीतिज्ञों के लिए रसूख का मसला बन गया है। उस दौर को बीते बमुश्किल कुछ दशक ही हुए होंगे जब चुनाव प्रचार पैदल, साईकल और खुली जीपों के जरिए होता था। पर अब तो महंगी गाड़ियों के साथ-साथ हेलीकाॅप्टर का भी प्रयोग जनता का वोट पाने के लिए हो रहा है। बिहार जैसे पिछड़े राज्य में सड़कों की बदहाली का हवाला देते हुए हर सियासी दल ने बीते चुनावों में जमकर हेलीकाॅप्टर का प्रयोग प्रचार के लिए किया। व्यवस्था की बदहाली का आलम यह है कि प्रचार से भी अध्कि पैसा चुनाव को मैनेज करने में खर्च होने लगा है।बहरहाल, चुनाव से पहले जनता की सेवा की कसमें खाते हुए कभी नहीं अघाने वाले नेता जब जीत जाते हैं तो सरकारी सुविधओं और पैसे के दुरूपयोग में जरा सा भी कोताही नहीं बरतते। और अगर नेताजी मंत्री बन जाएं तो पिफर क्या कहने! विदेश दौरे के नाम पर मजे-मजे में करोड़ों रुपए उड़ा देना तो इनके लिए बाएं हाथ का खेल बन जाता है। पिछले दिनों प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने मंत्रियों को विदेश दौरों में कटौती की सलाह दे डाली। इस पर कुछ मंत्रियों ने तो दिखावे के लिए ही सही अपनी एक-दो विदेश यात्राएं रद्द भी कर दीं। वहीं सियासी हलकों में खुद प्रधानमन्त्री के विदेश दौरे पर होने वालों बेशुमार खर्चों पर कनपफुसकी चलने लगी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने तो सरकारी खर्च कम करने के मकसद से साईकिल से ही दफ्रतर जाना शुरू कर दिया। यह बात अलग है कि उन्होंने अपने साईकिल सवारी का सियासी लाभ लेने का कोई भी मौका नहीं गंवाया।खैर, जिस प्रधानमन्त्री कार्यालय से मंत्रियों को खर्चे कम करने के लिए विदेश दौरों में कमी लाने की ताकीद की गई है वहीं विराजने वाले प्रधनमंत्रियों के विदेश दौरों पर सोलह मई 1996 से लेकर 2006 तक 371 करोड़ से अधिक पैसा खर्च किया जा चुका है। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत सामने आई है। इस दौरान सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी रहे। बजाहिर, विदेश दौरों पर होने वाले खर्चों के मामले में भी वे अव्वल हैं। उनके विदेश दौरों पर तकरीबन दौ सौ दस करोड़ रुपए की भारी-भरकम रकम सरकारी खजाने से खर्च की गई। 1997 में प्रधानमन्त्री के विदेश दौरों पर देश की जनता के द्वारा भरे जा रहे टैक्स में से तकरीबन तकरीबन इक्कीस करोड़ रुपए खर्च हुए। उस साल एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल प्रधानमन्त्री थे। अगले साल इस मद में लगभग चौदह करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह खर्चा गुजराल और वाजपेयी ने मिलकर किया। इतना ही पैसा 1999 में वाजपेयी के विदेश दौरों पर खर्च हुआ। 2000 में इस खर्चे को वाजपेयी ने घटाकर साढ़े दस करोड़ तक पहुंचा दिया। पर अगले ही साल यानी 2001 में इसमें जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर अड़तालीस करोड़ पर पहुंच गया। 2002 में यह आंकड़ा पचास करोड़ को पार कर गया। 2003 में वाजपेयी के विदेश दौरों पर तकरीबन बासठ करोड़ रुपए खर्च किए गए। 2004 में सत्ता बदली और नए प्रधनमंत्राी के रूप में मनमोहन सिंह ने बागडोर संभाली। इस साल दोनों प्रधनमंत्रियों के विदेश दौरों का खर्च तकरीबन पच्चीस करोड़ रहा। 2005 में अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के विदेश दौरों पर सरकारी खजाने में से तकरीबन 67 करोड़ और 2006 में लगभग 53 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह तो केवल प्रधानमन्त्री के विदेश दौरे का लेखा-जोखा है। इसके अलावा प्रधानमन्त्री के घरेलू दौरों पर भी हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। दूसरे मंत्रियों के विदेश दौरे समेत अन्य खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो यह भी अरबों में होगा। घरेलू यात्राओं के लिए मंत्रियों को कापफी सुविधएं दी जाती हैं। मंत्रियों और उनके परिजननों के स्वास्थ्य के देखभाल के नाम पर भी आमजन द्वार चुकाए जा रहे टैक्स में से हर साल करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा दिया जा रहा है। कहना ग़लत न होगा कि ये नेता चिकित्सा में हाने वाले खर्चों को वहन करने में पूरी तरह सक्षम हैं, इसके बावजूद इन्हें तमाम सुविधएं दी जा रही हैं। जबकि जिसके वोट की बदौलत ये सत्ता सुख भोग रहे हैं वह स्वास्थ्य सुविधओं के अभाव में दम तोड़ने को अभिशप्त है। पैंतालीस लाख रुपए वाजपेयी के स्वास्थ्य पर ग्यारह अप्रैल 2002 से लेकर चैबीस मार्च 2006 के बीच खर्च हुआ। इसी दरम्यान ना जाने कितने लोग महज कुछ रुपयों के अभाव में बुनियादी चिकित्सा से भी महरूम रहकर काल की गाल में समा गए होंगे। पर यह बात सियासत के सौदागरों के भेजे में नहीं घुसती, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था से पनपे इन सत्ताधिशो के लिए देश का आमजन बस वोट पाने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है।एक समय दलितों के वोट और सहयोग के बूते जगजीवन राम इस वर्ग के बड़े ताकतवर नेता बनकर उभरे थे। जब वे केंद्र में मंत्री थे तो उनकी बेटी एक बार विदेश यात्रा पर गईं। उन्हें वहां का खाना पसंद नहीं आया। यह जानकर दलितों के मसीहा माने जाने वाले जगजीवन राम ने एक विशेष विमान से हिंदुस्तानी रसोईया अपनी बेटी की खिदमत के लिए रवाना किया। इसी से नेताओं का दोहरा रूप उजागर होता है। एक तरपफ तो जगजीवन राम उन दलितों के हमदर्द होने का राग अलापते थे, जो दाने-दाने को मोहताज थे। वहीं दूसरी तरपफ उन्होंने अपनी बेटी के मुंह का जायका बिगड़ने से बचाने के लिए पल भर में सरकारी खजाने से लाखों उड़ाने में जरा भी संकोच नहीं किया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या वह सही मायने में दलितों के हमदर्द थे या पिफर सिपर्फ अपनी सियासत चमकाने के लिए वे खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश करते थे? अभी कुछ सालों से दलितों की देवी के तौर पर मायावती खुद को पेश करने लगी हैं। पर उनकी कथनी और करनी में भी व्यापक भेद स्पष्ट तौर पर दिखता है। उन्होंने करोड़ों का बंगला बनवाया है। वे कहती हैं कि इस महल के लिए उनके कार्यकर्ताओं ने दस-बीस रुपए करके चंदा दिया है। खैर, बहनजी सरकारी खर्चे पर उत्तर प्रदेश में जगह-जगह पर अपनी मूर्तियाँ भी लगवा रही हैं। बहनजी की सेवा के लिए पहले से ही दो सरकारी विमान थे लेकिन उन्होंने हाल ही में तीसरा विमान जनता के पैसे से खरीद डाला। ताम-झाम के साथ जन्म दिन मनाने के मामले में भी मायावती का कोई जोड़ नहीं है। पर प्रश्न यह है कि दलितों के नाम पर राजनीति करने वाली मायावती आखिर लखनउफ के पंचम तल पर बैठकर उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालते ही अपने पुराने दिनों को भुलकर जनता के पैसे को पानी की तरह बहाकर आखिर क्या संदेश दे रही हैं? उनके आचरण से तो यही बात सामने आ रही है कि हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ। मायावती का बचपन झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्ती में गुजरा है। एक समय ऐसा था जब वे एक-एक पैसे के लिए मोहताज थीं। घर की आर्थिक बदहाली की वजह से वे अपने छोटे भाई का ईलाज कराने के लिए कड़ी धुप में भी पैदल अस्पताल जाया करती थीं। दलितों की उपेक्षा और विपन्नता के सहारे ही उन्होंने अपनी सियासी पारी खेली है। पर यह कैसी विडंबना है कि एक बार सत्ता में आते ही बहनजी अपने पुराने दिनों को भूलकर उन्हीं कारनामों को अंजाम देने में लगी हैं जिन्हें कोसते हुए वे यहां तक पहुंची हैं। सरकारी खजाने से पैसा खर्च करने के मामले में देश के राष्ट्रपति भी पीछे नहीं रहे हैं। जब प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति बनीं तो अमरावती के उनके निजी आवास का नवीनीकरण लाखों रुपए के सरकारी खर्चे से किया गया। इसके अलावा खबर तो यह भी आई कि प्रतिभा ताई जब अमरावती जाएं तो उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हो इसलिए चार सौ करोड़ रुपए खर्च करके वहां एयरपोर्ट बनाया जाएगा। वैसे जनता का पैसा उड़ाने में पहले के राष्ट्रपति भी पीछे नहीं रहे हैं। नीलम संजीवा रेड्डी ने बतौर राष्ट्रपति जब अपना कार्यकाल पूरा कर लिया तो लाखों रुपए के सरकारी खर्चे पर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के अपने पुश्तैनी निवास को सुसज्जित करवाया था। कुछ समय बाद उन्होंने सरकार से कहा कि मेरा जी यहां नहीं लगता इसलिए मेरे रहने की व्यवस्था बंगलोर में की जाए तो पिफर लाखों खर्च करके उनके लिए व्यवस्था करवाई गई। जब शंकर दयाल शर्मा सेवानिवृत हुए तो उन्होंने भी अपने भोपाल के बंगले को लाखों के सरकारी खर्चे से सुसज्जित करवाया लेकिन खुद के रहने के लिए दिल्ली में भी अलग से व्यवस्था करवाई। कृष्णकांत जब उपराष्ट्रपति बने थे तो कहा जाता है कि उन्होंने लाखों खर्च करके सरकारी आवास में सजावट करवाई। ये वही कृष्णकांत थे जो कभी समाजवादी युवा तुर्क के नाम से मशहूर थे। सजावट पर जनता के धन को उड़ाने वाले मंत्रियों की तो लंबी फेहरिस्त है ही।वहीं दूसरी तरपफ ऐसे उदाहरण भी अपने देश में मौजूद हैं जिन्होंने अपने आचरण से एक अलग मिसाल कायम की। आजादी के पहले महाराष्ट्र और गुजरात एक ही राज्य होते थे। जब वहां के मुख्यमंत्री बीजी खैर बने तो उन्होंने एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया। उनका निवास मुंबई के उपनगर खार में था। उन्होंने सरकारी आवास लेने से मना कर दिया और खार से ही लोकल ट्रेन पकड़कर रोज चर्चगेट जाते थे। जहां से पांच मिनट पैदल चलने के बाद वे सचिवालय पहुंचते थे। वे कार का उपयोग केवल सरकारी काम के लिए ही किया करते थे। ऐसा ही उदाहरण 1977 में देश के प्रधनमंत्राी बने मोरारजी देसाई ने भी पेश किया था। चार्टर्ड विमान उपलब्ध् होने के बावजूद वे इसका इस्तेमाल यदा-कदा ही किया करते थे। आमतौर पर वे अपनी यात्राएं यात्री विमान से ही किया करते थे। आज जरूरत इस बात की ही देश के कर्णधर अपने आचरण से ऐसे ही उदाहरण पेश करें ताकि सियासतदानों और सियासत के साथ-साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी लोगों का भरोसा कायम रह सके।

लेखक ‘मीडिया स्कैन’ मासिक के संपादक हैं।

1 टिप्पणियाँ:

dayanidhibatsa ने कहा…

kya kiya jaaye bandhu, is desh me sewak hi shasan karte hain, sewak bane raho aur mauzan hi mauzan.