गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

चुनाव में अरबों का खर्च


नई दिल्ली। देश और दुनिया भली ही आर्थिक मंदी से जूझ रही हो, लेकिन भारत के लोकतांत्रिक उत्सव में इसकी कही झलक भी नहीं देखी जा रही है। जिस तरह उत्सव में हैसियत से ज्यादा खर्च करने की हमारी आदत रही है। वहीं सब लोकसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। लगभग 10 हजार करोड़ इस पर्व में खर्च होने का अनुमान है। जिसमें राजनीतिक दलों का बजट और उम्मीदवारों द्वारा खर्च किए जाने वाला धन शामिल है। इस बार के चुनाव में तकनीकी संसाधनों का सबसे ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। उसमें मुख्य रूप से इलेक्ट्रानिक और इंटरनेट के साधन सर्वाधिक है। कांग्रेस भाजपा सहित बड़े राजनैतिक दल पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे हैं। कांग्रेस के चुनाव अभियान में विज्ञापन के लिए तीन एड एजेंसियों की सेवा ली है। जिसे घोषित रूप से 150 करोड़ आवंटित किए हैं। भाजपा ने करीब 100 करोड़ रूपए एड एजेंसी को दिए हैं। चुनाव अभियान में विज्ञापनों के लिए दिया गया यह पैसा नाममात्र है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग चुनावी प्रकिया को सम्पन्न कराने के लिए लगभग 12 सौ करोड़ खर्च करेगा। इस लोकसभा चुनाव में 74 करोड़ से अधिक मतदाता अपने 543 उम्मीदवारों का चुनाव करेंगे। इस मंदी के दौर में उद्योग कम हो रहे हैं। नौकरियां कम पड़ती जा रही है। 30 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर है। कही भूख और कही कुपोषण से भी पीडि़त है। ऐसी स्थिति एक माह में 10 हजार करोड़ खर्च होना एक विचारणीय प्रश्न है। चुनाव आयोग में वैसे तो प्रत्याशियों की खर्च करने की सीमा 25 लाख रूपए निर्धारित की है, लेकिन चुनाव में इससे कही गुना अधिक खर्च हो रहा है। औसतन 16 करोड़ रूपया एक संसदीय क्षेत्र में खर्च होगा। प्रश्न यह खड़ा होता है कि राजनीतिक दलों के पास यह सब कहा से आ रहा है। देश के औद्योगिक घराने इन्हें घोषित रूप से चंदा दे रहे हैं जो इनके हाथों में दर्शाए गए हैं, लेकिन ऐसा पैसा भी इन औद्योगिक घरानों द्वारा राजनीतिक दलों और नेताओं को दिया जा रहा है। जिसका कही उल्लेख नहीं है। बिरला ने 21।71 करोड़ कांग्रेस को और 2.96 करोड़ भाजपा को दिए। सिलवासा के पब्लिक एंड पॉलिटिकल ने भाजपा को 9.5 करोड़ दिए। यह ट्रस्ट स्टारलिट के मालिक अनिल अग्रवाल का है। अग्रवाल देश के सबसे बड़े एल्युमीनियम उत्पादन और निर्यातक के सबसे बड़े समूह के मुखिया है। विडियोकोन ने कांग्रेस को 4.5 और भाजपा को 3.5 करोड़ रूपए बतौर चुनावी चंदा दिया है। अन्य छोटे दल शिवसेना, पीडीपी को भी लाखों में चंदा दिया है। गुजरात का आदानी समूह भाजपा को चंदा देने में सबसे आगे है। उसने 4 करोड़ रूपया चंदे के रूप में दिया साथ ही कंपनी का चार्टर प्लेन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार अभियान संचालित करने को दिया है। कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल जो जिंदल समूह के प्रमुख है ने कांग्रेस के अलावा भाजपा को भी चंदा दिया है। एएण्डटी, महिन्द्रा ग्रुप, बजाज, माल्याग्रुप, रियल स्ट्रेट कंपनियों के साथ कहीं समूहों ने राजनीतिक दलों को चंदा दिया है। यह चंदा इसलिए विचारणीय है कि जिन राजनीतिक दलों को इन घरानों ने बतौर चुनावी चंदा दिया है। वह चुनाव बाद इस चंदे की भरपाई किस रूप में करेंगे। एक ओर राजनीतिक दल के उम्मीदवार जनता में सेवा के नाम पर वोट मांग रहे हैं। यह विजयी होने के बाद जनता की सेवा करेंगे या इन औद्योगिक घरानों ने चुनाव लड़ने के लिए इन्हें धन उपलब्ध करवाया। पिछले कुछ चुनावों में यह देखने को आ रहा है कि इसमें धन, बल और बाहुबल का उपयोग बड़ा है। यह सब लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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