रविवार, 13 जून 2010

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग-- अभी भी बटला हाउस ‘एनकाउंटर’ की जांच को तैयार



राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग  की बटला हाउस एनकाउंटर मसले को लेकर उलझने बढ़ती ही जा रही हैं। पहले तो आयोग ने इस मामले को फर्ज़ी एनकाउंटर की सूची में रखते हुए दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दे दिया और अब सूचना के अधिकार क़ानून के तहत दिए गए एक जवाब में बताया है कि आयोग ने बाटला मुठभेड़ मामला में अपने दल को जांच के लिए घटनास्थल पर नहीं भेजा क्योंकि निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए संबद्ध विभाग द्वारा भेजी गई विभिन्न रिपोर्टें पर्याप्त पाई गई थी।
आगे उन्होंने बताया कि  इस मामले में न ही कोई अधिकारी उस स्थान पर जाकर जांच किया और न ही इस संबंध में किसी से बात की गई है। यानी सिर्फ दिल्ली पुलिस ने इन्हें जो कागज़ात उपलब्ध करा दिए उसी के आधार पर उन्होंने अपनी पूरी रिपोर्ट बना दी। सच पूछिए तो आयोग ने दिल्ली पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए गए कागज़ों की भी जांच नहीं की और न ही उसे ठीक से पढ़ा। बल्कि रिपोर्ट में इस जिन मेडिकल रिपोर्ट्स  का ज़िक्र किया गया, उसकी प्रतिलिपी भी आयोग के पास उपलब्ध नहीं है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी नहीं पढ़ा गया और न ही इस कार्य के लिए किसी फारेंसिक विशेषज्ञ की मदद की मदद ली गई। शायद अगर आयोग सिर्फ पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी पढ़ा होता तो दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट नहीं मिलती।
आयोग को इस बात की भी जानकारी नहीं है कि बटला हाउस मुठभेड़ मामले की जांच के दौरान कितना समय तथा पैसा लगा। सूचना के अधिकार के तहत एक जवाब में बताया कि इस मामले की जांच में करीब 11 महीने का समय लगा था, जबकि उससे पूर्व एक जवाब में बताया है कि 9 महीने का समय लगा था। जबकि खर्च की कोई जानकारी अब तक आयोग ने नहीं दिया है।
 राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग  ने ऐसे दिशा-निर्देश तैयार किए हैं जिनके अंतर्गत मुठभेड़ में हुई मौतों के मामलों में मजिस्ट्री जांच की जाती है। तो फिर बटला हाउस मुठभेड़ मामले में कोई मजिस्ट्री जांच क्यों नहीं की गई। इस प्रश्न के उत्तर में आयोग का कहना है कि दिल्ली के गवर्नर ने इस मामले में मजिस्ट्री जांच के लिए आदेश पारित करने से मना कर दिया था।
जब आयोग से यह पूछा गया कि क्या आयोग जिनके खिलाफ शिकायत दर्ज है, उनसे या जिसने शिकायत दर्ज कराई है, उससे या उसके किसी गवाहों से बात करती है या नहीं। यदि नहीं, तो क्यों नहीं। और यदि हां, तो बटला हाउस एनकाउंटर मामले में आयोग ने एम.सी.शर्मा, आतिफ और साजिद के पिता या परिवार के किन लोगों से बात की है। तो इस प्रश्न के उत्तर में आयोग का कहना है कि आयोग द्वारा प्रत्येक मामले की जांच मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम-1993 की धारा-17 के उपबंधो के अनुसार की जाती है। सबसे पहले संबद्ध विभाग से रिपोर्ट मांगी जाती है, यदि वह रिपोर्ट संतोषजनक पाई जाती है, तो जांच बंद कर दी जाती है। हालांकि यदि रिपोर्ट अधूरी अथवा असंतोषजनक पाई जाती है,तो आयोग स्वयं जांच प्रारंभ कर सकता है।  यानी आयोग अभी भी जांच प्रारंभ करने को तैयार है।

एक दिलचस्प बात यह है कि आयोग फर्ज़ी मुठभेड़ों की संख्या को लेकर पशो-पेश में है। सही तादाद शायद उसे भी पता नहीं है या फिर सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते हुए गलत जानकारी दे रही है क्योंकि सूचना के अधिकार के तहत मिले कागज़ात कुछ ऐसा ही बयान कर रहे हैं। सर्वप्रथम दिनांक 24 सितंबर 2008 को जब आयोग से मैंने यह पूछा कि अब तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग   के समक्ष कितने पुलिस मुठभेड़ के मामले आए हैं, उनमें से कितने मुठभेड़ों को आयोग ने फर्ज़ी मुठभेड़ माना है तो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग   का जवाब था—आयोग में उपलब्ध रिकॉर्ड्स के मुताबिक अब तक पुलिस मुठभेड़/तथाकथित फर्जी मुठभेड़ के 2560 मामले दर्ज हैं, उनमें से 16 मामलों में मुवाअज़ा दिया है। आगे उन्होंने बताया कि इन 16 मामलों में से 8 मामलों में मानव अधिकार का उल्लंघन पाया गया है, जिसे अब बंद कर दिया गया और 8 मामले अभी चल रहे हैं। इन 8 मामलों का केस नम्बर भी उपलब्ध कराया।
आगे पुनः मैंने 02 मार्च 2009 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग  से फर्जी मुठभेड़ों की सूची मांगी तो आयोग ने 1224 मामलों की सूची उपलब्ध कराई। सूची के प्रथम पृष्ठ पर ही शिर्षक ‘Fake Encounter’ अंकित था और इस सूची में बटला हाउस एनकाउंटर भी दर्ज था। इसके साथ यह भी बताया गया कि आयोग ने सिर्फ 7 मामलों में मुवाअज़ा दिया है। इन 7 मामलों की सूची भी उपलब्ध कराई गई, जिनमें 5 मामले पहले उपलब्ध कराए गए सूची से मेल खाते थे।
आगे पुनः दिनांक 06 अप्रैल 2010 को आयोग से पूछा कि अब तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के समक्ष कितने फर्ज़ी मुठभेड़ों के मामले आए हैं।इसके जवाब में आयोग का कहना है कि आयोग में दिनांक 31.03.2010 तक फर्जी मुठभेड़ों के मौतों के आरोपों की 1366 शिकायतें प्राप्त हुई हैं।
दूसरे प्रश्न में मैंने पूछा कि कितने मामलों में आयोग ने पुलिस की भूमिका को संदिग्ध/दोषी/गैर-ज़िम्मेदाराना पाया है। तो आयोग का कहना है कि कुल 977 मामलों, जिनमें जांच पूरी कर ली गई हैं, में से आयोग ने 14 मामले फर्जी पाए तथा मुआवज़े की संस्तुति की। आगे मैंने पूछा कि आयोग ने किन मामलों को निरस्त किया है अथवा गलत पाया है। अलग से एक सूची उपलब्ध कराएं। तो आयोग ने बताया कि आयोग ने कुल प्राप्त की गई 977 शिकायतों में से 963 मुठभेड़ों को सही पाया। इन मामलों को बंद कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त आयोग ने सूचना के आधार पर 1590 मामले दर्ज किए। इनमें से 869 मामलों की जांच पूरी कर ली गई है तथा आयोग ने 13 मामले फर्ज़ी पाए हैं। शेष 856 मामले सही पाए गए। एक प्रश्न के उत्तर में आयोग ने कहाआयोग ने दिनांक 31.03.2010 तक विभिन्न सूचनाओं और प्राप्त की गई शिकायतों पर विचार करने के पश्चात 27 मामलों में मुवाअजे की संस्तुति की है।
आयोग के जवाब में हर तरफ झोल ही झोल है। अब यह सूचना के अधिकार का मज़ाक नहीं तो क्या है। और जब यह हाल के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का है तो बाकी का अंदाज़ा आप स्वयं लगा सकते हैं।   






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